” चंदेरी में ‘बामियान’ चल रहा, पुरातत्व विभाग नींद में “

JAIN SANT NEWS

यह अफगानिस्तान का बामियान नहीं है। यह भारत के पर्यटन स्थल, चंदेरी की साड़ियों के लिए प्रसिद्ध मध्यप्रदेश के एतिहासिक नगर चंदेरी के खंदारगिरि पर्वत के दृश्य हैं। यहां एक हजार साल पुरानी 46 फुट ऊंची प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ की प्रसिद्ध जैनप्रतिमा को तोड़ने का काम लगा हुआ है। बताया गया है कि पूरे पहाड़ पर कर्फ्यू के हालात हैं, कोई ऊपर जाकर तस्वीरें भी नहीं ले सकता। ये तस्वीरें कल तकरीबन स्टिंग आपरेशन करके ली गई हैं। ड्रिल मशीनों की मदद से पूरी प्रतिमा लगभग नष्ट कर दी गई है। तोड़े जाने से पूर्व की और बाद की प्रतिमा देखें तो आंखों के सामने बामियान ताजा हो जाता है।

चंदेरी के खंदारगिरि की जैन प्रतिमाएं और प्रतिमाओं से सज्जित गुफाओं का निर्माण प्रतिहारवंशी राजाओं द्वारा सन् 900 से 1226 तक कराया गया था। यह जानकारी वहां के शिलालेखों से मिलती है। इस पहाड़ के आसपास ब्राह्मी लिपि के लेख और जैन तीर्थंकरों के चिंहों की 2100 वर्ष पुराने पत्थरों पर उत्कीर्णन को हाल ही में स्थानीय इतिहासकार डा. अविनाश जैन ने खोजा है। शैलचित्रों से भरे आदिमानवों के शैलाश्रयों की भी श्रंखलाएं है। जाहिर है भारतीव पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस पूरी साइट क़ ही संरक्षित घोषित कर रखा है। …ऐसी स्थिति में वहां की सबसे प्रसिद्ध 46 फीट की आईकान प्रतिमा को तोड़े जाने की खबर पुरातत्व विभाग को न हो यह संभव नहीं है। तोड़ने वाली जैन संस्था को ऐसी विनाशकारी अनुमति किसने दी है यहां जांच का विषय है। अनुमति क्या जीर्णोद्धार के नाम पर ले कर प्रतिमा को पूरी तरह नष्ट करके वहां नई प्रतिमा रख देने की साजिश यदि रची गई है तो सवाल उठता है कि इतिहास और पुरातत्व विषय का ही महत्व क्या है? मत पढ़ाइए, संरक्षण बंद कर दीजिए। कानून की किताबों से पुरातत्व अधिनियम को ही विलोपित कर दीजि!

बुंदेलखंड में प्रसिद्ध जैन प्रतिमाओं को तोड़ कर वहां दूसरी प्रतिमा यह पहला मामला नहीं है। लगता है कि किसी समूह या व्यक्ति विशेष की इच्छानुसार सभी प्राचीन प्रतिमाओं को बदल देने का अभियान चल रहा है। … लेकिन इसमें पूरे जैन संप्रदाय को विश्वास में क्यों नहीं लिया जा रहा। क्या इस साजिश के पीछे दिगंबर जैनों के भीतर ही फिरकों या पंथों का संघर्ष काम कर रहा है। लेकिन उनके इस आपसी संघर्ष से भारतीय पुरातत्व अधिनियम को क्या लेना देना। एतिहासिक स्मारकों का संरक्षण उसका कानूनी दायित्व है।

बुंदेलखंड की प्राचीनतम जैन प्रतिमाओं को पूरा तोड़ कर उनकी जगह नई बनाने के पीछे की मंशा महज जीर्णोद्वार को लेकर समझ नहीं आती। बताया जाता है कि इनकी जगह नई बनाई जा रही प्रतिमाओं में मूल प्रतिमा के साथ उकेरी गई विग्रह प्रतिमाओं, यक्ष यक्षिणी, द्वारपाल, देव प्रतिमाओं को बनाया वापस दोबारा नहीं बनाया जाता। इस दरसल बीस पंथी और तेरह पंथी जैन आमनाओं का मतभेद है जिसका निशाना हजार साल पुरानी प्रतिमाएं बन रही हैं। …यदि ऐसा नहीं है तो इतने बड़े पर्वत पर किसी भी जगह उससे बड़ी और सुंदर प्रतिमाएं नई स्थापित की जा सकती हैं। इतिहास को विकृत करने की क्या आवश्यकता है? दिल्ली स्थित तीर्थ संरक्षिणी महासभा सहित जैन समाज के ज्यादातर तबकों को इस पर सख्त आपत्ति है इसीलिए ये मूर्तियां तोड़ने का काम रात में लगाया जाता है और वहां आवाजाही बंद कर दी जाती है। मुख्य नगरों से दूर जंगलों के बीच पहाड़ों पर होने से जिलाप्रशासन को भी देर से ही भनक लगती है। लेकिन पुरातत्व विभाग के कर्मचारी क्या कर रहे होते हैं?

मैंने स्वयं इस बारे में केंद्रीय मंत्री संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल से बात की और उनका पक्ष जानना चाहा। वज सुन कर ही हैरत में रह गए कि इतनी बड़ी घटना उनके संज्ञान में क्यों नहीं लाई गई! …इस मामले में कानून के सम्मान का सवाल सर्वोपरि है। सुप्रीम कोर्ट और मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को तत्काल सुमोटो एक्शन ले लेना चाहिए। मेरी जानकारी के मुताबिक प्राचीन जैन प्रतिमाओं को निशाना बना रहे समूह का अगला निशाना बूढ़ी चंदेरी की विशाल भगवान पार्श्वनाथ प्रतिमा सहित अशोकनगर, टीकमगढ़ जिलों की कुछ विशालकाय प्रतिमाएं शामिल हैं।
– डा. रजनीश जैन, सागर

Comments (0)

Your email address will not be published. Required fields are marked *