
श्रावक के बारह व्रत
आशीर्वाद – मुनि श्री 108 प्रमाण सागर जी महाराज
व्रतों का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है| व्रतों से ही जीवन की सार्थकता है| व्रत विहीन जीवन ब्रेक रहित गाड़ी की तरह है| प्रत्येक व्यक्ति को किसी ना किसी रूप में व्रतों का पालन करना चाहिए|
प्रायः व्रत-संयम की चर्चा आते ही लोग इसे खान-पान की शुद्धि तक सीमित मानकर इसे एक जटिल प्रक्रिया मानते है जबकि अणुव्रतों का स्वरुप अत्यंत व्यापक है| एक दिन की हिंसा त्यागने वाले को यमपाल चांडाल को ही शास्त्रों में अणुव्रती कहा गया है|
परम पूज्य मुनि प्रमाण सागर जी महाराज ने बारह व्रतों की आधुनिक सन्दर्भ में व्याख्या कर इसे सर्व ग्राह्य और स्वीकार्य बना दिया है| मुनि श्री ने इन व्रतों की व्याख्या इस प्रकार की है कि साधारण व्यक्ति भी इनका पालन करके अपने जीवन का कल्याण कर सकता है| आप सभी सुधीजन व्रतों का पालन करें, इसी भाव से आपके लिए यह प्रस्तुत है|
पाँच अणुव्रत
- अहिंसा व्रत – संकल्पी हिंसा का त्याग, मद्य-माँस-मधु का त्याग, चमड़े का त्याग, सिल्क और हिंसक सौंदर्य प्रशाधनों का त्याग
अतिचार-
१. बंध – किसी को मरना, पीटना
२. बंधन – पालतू पशुओं और आश्रित कर्मियों को जरुरत से ज्यादा नियंत्रण में रखना
३. छेदन – दुर्भावना पूर्वक नाक-कान आदि छेदना, नकेल लगाना, नाथ देना आदि|
४. अतिभारारोपण – किसी पर अधिक भार लादना|
५. अन्नपान निरोध – पालतू पशुओं और नौकर-चाकरों को समय पर भोजन नहीं देना, ठीक भोजन नहीं देना|
- सत्याणुव्रत – स्थूल झूठ का त्याग| जहाँ सच से काम चल जाये, वहां झूठ नहीं बोलना|
अतिचार –
१. परिवाद– किसी के साथ गली-गलौच करना
२. रहोभ्याख्यान – दुसरो कि गुप्त बातों को उजागर कर देना|
३. पैशून्य – चुगलखोरी
४. कूटलेख करना – नकली दस्तावेज बनाना, झूठी गवाही देना, जाली मुहर लगाना (यथासंभव बचें)
५. न्यासापहार – दूसरों की धरोहर हड़प लेना|
- अचौर्याणुव्रत – स्थूल चोरी, टाला तोडना, सेंध मरना, लूट-खसौट करना आदि का त्याग
अतिचार
१. चौर प्रयोग – चोरी की योजना बनाना, चोरों को प्रोत्साहित करना
२. चौरार्थ आदान – चोरी का माल खरीदना
३. विलोप – राजकीय नियमों का उल्लंघन करना (यथासंभव बचें)
४. प्रतिरूपक व्यवहार – मिलावट करना
५. हीनाधिक मानोन्मान – नाप-तौल में कमती-बढ़ती करना, डंडी मारना
- ब्रह्मचर्याणुव्रत – अपने पति या पति के अतिरिक्त किसी अन्य से शारारिक सम्बन्ध नहीं बनाना|
अतिचार –
१. परविवाहकरण – अपने पारिवारिक दायित्व से बहार के लोगों के शादी विवाह करने में रूचि नहीं लेना
२. इत्वरिका गमन – गलत चाल वाले विवाहित स्त्री/पुरुषों के साथ उठना-बैठना
३. अनंगक्रीडा – अप्राकृतिक यौनाचार करना
४. विटत्व – भोड़ापन करना, फूहड़पैन अपनाना, भांडगिरी करना
५. विपुलतृषा – काम की तीव्र लालसा रखना
- परिग्रह परिमाणव्रत – अपनी सम्पति की स्थूल सीमा बनाना
अतिचार
१. अतिवाहन – अधिक भाग-दौड़ करना
२. अतिसंग्रह – अधिक मुनाफाखोरी की चाहत में जरुरत से ज्यादा संग्रह करना
३. अतिविस्मय – अधिक लाभ में हर्ष और दूसरों के अधिक लाभ में विषाद करना
४. अति लोभ – मनचाहा लाभ होने पर भी और अधिक लाभ की चाह होना
५. अतिभार वहन – नौकर-चाकर और पालतू पशुओं से जरुरत से ज्यादा काम लेना, उनसे अधिक भाग-दौड़ करवाना
तीन गुणव्रत
- दिग्व्रत – जीवन पर्यन्त के लिए दशों दिशाओं की सीमा बनाकर उससे बाहर ना आने-जाने का संकल्प, यथा-विदित विश्व से बाहर नहीं जाने का संकल्प, उर्ध्व एवं अधोदिशा में जहाँ तक आज के साधन जाते हैं उसमे आगे जाने का संकल्प लेना
अतिचार –
१. उर्ध्व व्यतिक्रम – ऊपर की सीमा का उल्लंघन
२. अधो व्यतिक्रम – नीचे की सीमा का उल्लंघन
३. तिर्यक व्यतिक्रम – तिरछी सीमा का उल्लंघन
४. क्षेत्र वृद्धि – लोभवश पूर्व निर्धारित क्षेत्र को बढ़ाना
५. स्मृत्यंतराधन – अपनी सीमा को भूल जाना
- अनर्थदण्ड त्यागव्रत – प्रयोजनहीन पाप क्रियाओं का त्याग
१. पापोपदेश – बिना प्रयोजन पाप पूर्ण व्यापर आदि की प्रेरणा देना
२. हिंसा दान – हिंसक उपकरणों को प्रदान करना
३. अपध्यान – व्यर्थ में किसी की जीत-हार आदि का विचार करना
४. दु:श्रुति – चित्त को कलुषित करने वाला साहित्य पढ़ना, T.V. देखना, गीत आदि सुंनना
५. प्रमादचर्या – बिना मतलब पानी बहाना, अग्नि जलाना, धरती खोदना, पंखा चलाना, वनस्पति तोडना उक्त पाँचो प्रकार के अनर्थदण्ड का त्याग
अतिचार –
१. कंदर्प – फूहड हँसी-मजाक से युक्त अशिष्ठ वचन कहना
२. कौत्कुच्य – हँसी मजाक के साथ शारीरिक कुचेष्टा करना
३. मौखर्य – अधिक बकवाद करना
४. अतिप्रसाधन – भोगोपभोग की सामग्री का आवश्यकता से अधिक संग्रह करना
५. असमीक्ष्य-अधिकरण – प्रयोजनहीन अधिक प्रवृति करना
- भोगोपभोग परिमाणव्रत – भोग और उपभोग की वस्तुओं का सीमित समय अथवा जीवन पर्यन्त के लिए त्याग करना
भोग – एक बार सेवन योग्य भोजन आदि
उपभोग – बार-बार प्रयोग में आने योग्य- वस्त्राभूषण आदि
भोगोपभोग परिमाण व्रत इस प्रकार लें –
१-२. मद्य-माँस-मधु और मक्खन का आजीवन त्याग (त्रसघात और प्रमादवर्धक से बचने हेतु)
३. बहुविघात से बचने हेतु – सभी प्रकार के जमीकंद का त्याग करे तथा पत्तेदार सब्जियों का कम से कम बरसात में त्याग
४. अनुपसेव्य – शिष्टजनों द्वारा सेवन के अयोग्य स्वमूत्रपान आदि के सेवन का त्याग
५. अनिष्ट – जो अपने स्वास्थ्य के अनुकूल ना हो उसका त्याग
प्रतिदिन के नियम
भोजन – क्या और कितनी बार
वाहन – कितने
शयन – कितनी देर और किस प्रकार
स्नान – कितनी बार
साबुन/तेल –
पुष्प –
प्रसाधन सामग्री –
पान/सुपारी –
आभूषण –
- V. देखना / गीत-नृत्य करना –
काम सेवन / ब्रह्मचर्य –
उक्त बातों पर विचार लेकर अपनी सुविधानुसार सीमित समय के लिए नियम लेते रहे|
अतिचार –
१. अनुपेक्षा – विषयों के प्रति उदासीनता ना होना
२. अनुस्मृति – पूर्व में भोगे हुए विषयों की निरंतर स्मृति बने रहना
३. अति लौल्य – आगामी विषयों के प्रति अत्यधिक लोलुपता रखना
४. अति तृषा – भावी विषयों के प्रति तीव्र गृद्धता और तृष्णा का भाव रखना
५. अति अनुभव – विषयों का अति आसक्ति पूर्वक अनुभव करना
चार शिक्षाव्रत
- देशव्रत – दिग्वृत में स्वीकृत मर्यादा को सीमित समय के लिए और सीमित करना| यह नियम घडी-घंटा, प्रहर, दिन-रात, सप्ताह, पक्ष, मास, ऋतू, वर्ष आदि की मर्यादा कर लिया जा सकता हैं|
अतिचार
१. आनयन – मर्यादित क्षेत्र के बाहर से किसी को बुलाना
२. प्रेष्य प्रयोग – मर्यादित क्षेत्र के बाहर किसी को भेजना
३. शब्दानुपात – मर्यादित क्षेत्र के बाहर शब्दों द्वारा संपर्क रखना, टेलीफोन/मोबाइल करना
४. रूपानुपात – मर्यादित क्षेत्र के बाहर स्थित व्यक्ति को अपने शारीरिक इशारे से अपनी ओर आकर्षित करना
५. पुदगलक्षेप – मर्यादित क्षेत्र के बाहर स्थित व्यक्ति को कंकड़-पत्थर आदि फेंककर अपनी ओर आकृष्ट करना
- सामायिक – प्रतिदिन दो समय सामायिक करना| सामायिक में पंच परमेष्टि का स्मरण, माला, जाप, आत्मचिंतन आदि करना चाहिए|
अतिचार –
१. वचन दुष्प्रणिधान – वचनों की खोटी प्रवृति यथा- कुछ का कुछ पाठ करने लगना, सामायिक में बोल देना आदि|
२. काय दुष्प्रणिधान – सामायिक में शरीर को स्थिर ना रखना, अंगड़ाई लेना, जम्हाइयाँ आदि लेना
३. मन दुष्प्रणिधान – मन में अस्थिरता रखकर इधर-उधर की बातें सोचना
४. अनादर – सामायिक में उत्साह नहीं होना
५. अस्मरण – सामायिक पाठ आदि भूल जाना
- प्रोषधोपवास – अष्टमी- चतुर्दशी को एकासन पूर्वक उपवास करना अथवा कम से कम अष्टमी-चतुर्दशी को एकासन करना
अतिचार
१. बिना देखे शोधे वस्तुओं को उठाना/ रखना
२. बिना देखे शोधे अपने बिस्तर आदि को बिछाना
३. बिना देखे सोधे अपने मल-मूत्र का त्याग करना
४. अनादर – सामायिक आदि आवश्यकों में आदर या उत्साह नहीं होना
५. अस्मरण – अपने आवश्यकों को ही भूल जाना
- अतिथि संविभाग व्रत – उत्तम, मध्यम, जघन्य तीन प्रकार के पात्रों को आहार देकर भोजन करना, मुनियों की आहार बेला टालकर भोजन करना, गाँव में मुनि हो तो यथा संभव आहार देकर या देखकर भोजन करना| (कहीं बाहर जाना हो या ट्रैन पकड़नी हो तो उसकी छूट)
अतिचार –
१. सचित्त निक्षेप – सचित्त पत्र आदि भूमि पर आहार रखना
२. सचित्त अविधान – सचित्त पत्र आदि से भोज्य पदार्थ ढकना
३. परव्यपदेश – स्वयं देने योग्य वास्तु को दुसरो से दिलाना
४. मात्सर्य – अन्य दाताओं के गुण को सह ना पाना
५. कालातिक्रम – आहार के काल का उल्लंघन कर पड़गाहन आदि करना
उक्त बारह व्रतों का अतिचार रहित पालन करने से दूसरी प्रतिमा का अभ्यास हो सकता हैं|
