द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव को योग्य करने का नाम वास्तु है:, मुनिश्री आदित्य सागर

वास्तु न मिथ्यात्व है ना विपरीत कला है और ना ही किसी को ठगने का पुरुषार्थ है। द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव इनको योग्य करने का नाम वास्तु है। जिस प्रकार चेतन जीव की शारीरिक मानसिक, और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को दूर करने वाले चिकित्सक होते हैं उसी प्रकार एक वास्तुविद भी अचेतन वस्तु के […]

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