भाग पाँच : मैं…मुनिभक्त रावण! – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

रावण @ दस : भाग पाँच मैं और मेरा परिवार मुनिभक्त था। हम सदा मुनिसेवा और उनके उपदेशों को ग्रहणकर नियम पालन किया करते थे। मैं अभिमानी भी नहीं था। जब कभी मुझसे अशुभ कर्म के उदय के कारण कोई अशुभ कार्य हुआ तो उसका मैंने प्रायश्चित भी किया। मेरे जीवन में अमिट छाप छोड़ […]

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