गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी के अवतरण महोत्सव पर नमन
इस यह त्याग तप की मुर्ति
समता रस की प्रतिमूर्ति
स्वस्तिधाम जैसी बनाई अनुपम कृति
सबका मङ्गल करने वाली
जय हो माँ स्वस्ति


मोती पुष्पाजी की तुम थी अनुपम मोती
जु यु बाला बड़ी हुई वैराग्य का बीज बड़ा चली
आज वह पावन दिन है जो सचमुच एक अहम दिन है जी हा भारत गौरव गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने जन्म लिया यह नारी शक्ति का प्रतिरूप व जैन जगत का गौरव है पूज्य माताजी के कृतित्व का वर्णन करे तो शिक्षा MA संस्कृत तक कर संयम त्याग पद की और अग्रसर हुई। प्रथम ब्रह्मचर्य व्रत सन 1985 मे 5 वर्ष के लिए आचार्य पुष्पदन्त सागर जी महाराज से ग्रहण किया व पद पथ पर बढ़ते हुए सन 1991 मे आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से 2 वर्ष का पुनः ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया।
आगे बढ़ चली 1992 मे त्रिलोक तीर्थ प्रणेता आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज से आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया औऱ ग्रह त्याग कर दिया। लेकिन वह रुकी नही, नारी का सर्वोत्कृष्ट पद आर्यिका दीक्षा विद्याभूषण आचार्य सन्मति सागर जी महाराज से इटावा उत्तरप्रदेश में आर्यिका दीक्षा ली। इनकी रचित विशेष कृति जिनपद पूजाजलि जो काफी चर्चित है।


पूज्य गुरु माँ हम सबका गौरव है जी हा इनके द्वारा 80 से अधिक गद्य पद्य व पूजन विधान लिखे जा चुके है यही अध्यात्म और साधना को दर्शाता है। अनेक मंदिर के जिनालयों की प्रतिष्ठा व पंचकल्याण महोत्सव आपकी निश्रा सम्पन्न हो चुके है।
माताजी स्वकल्याण व परकल्याण की भावना से ओतप्रोत है आपने केंद्रीय जेलो में कैदियो को उदबोधन कर उन्हे अपराध मुक्त रहने की प्रेरणा प्रदान की वही माताजी द्वारा विभिन्न कोचिंग संस्थानो व विद्यालयों के माध्यम से 2लाख से अधिक बच्चो को प्रेरणा दायक उदबोधन भी प्रदान किया है समय समय पर माताजी द्वारा साधना शिविर का भी आयोजन किया जाता रहा है माताजी 30000 किलोमीटर से अधिक पदविहार कर जन जन मे धर्म की महती प्रभावना की है आपने सम्मेदशिखर सिद्ध क्षेत्र की 125 से अधिक वंदना की
दीर्घायु हो पूर्णआयु हो
आप चिरायु हो
हम सबकी भी उम्र लग जाए आप शतायु हो
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
