माता पिता बनना बहुत बड़ी साधना है निर्वेग सागर जी
पूज्य मुनि श्री निर्वेग साग़र जी महाराज ने पालक सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा की माता पिता बनना बहुत बड़ी साधना है , क्योंकि माता पिता बनते ही पूज्यता का भाव पैदा हो जाताहै। पूज्य पिताजी। , पूज्य माताजी। अतः माता पिता पूज्यता के भाव को प्राप्त हो जाते हैं। अब जैसे ही सन्तान का जन्म होता है , मातापिता का कर्तव्य होता है कि अपने सुखों को त्याग करके बच्चों के भविष्य के बारे में सोचे । माता पिता बनते ही साधना प्रारम्भ हो जाती है ,
जैसे – मुनिराज , आर्यिकाओं की दीक्षा लेते ही साधना प्रारम्भ हो जाती है। इसी प्रकार अभी तक तो पति पत्नी दो ही होते है । फिर जब बीच में बेटा या बेटी आ जाती है। बेटा बेटी के प्रति हमारा ये कर्तव्य होता है कि इसको इस लायक बनाया जाय कि वो विद्वानों की सभा में आगे आकर के बैठ जाये। मातापिता बच्चों को कैसे संस्कार दे , ये बड़ी महत्वपूर्ण बात होती है। पहले इतने भौतिक संसाधन हमारे सामने नहीं थे और ज्यादा संस्कारों की भी आवश्यकता नहीं पड़ती थी , क्योंकि पासमें मन्दिर होता था , आसपास खेलना कूंदना होता था।

टीवी मोबाइल थे नहीं और संगीत गाना बजाना चलता नहीं था। जो कुछ करना घर में ही बच्चे करते थे और शाम को मम्मी के पास समय बहुत होता था। वो सब बच्चों को बैठकर के कहानियां सुनाती थी । ” हमें याद है जब हम छोटे थे उस समय , आचार्य शांतिसागर जी महाराज का नाम सबने सुना होगा , जिन्होंने अपने मुनि जीवन में 35 वर्ष की मुनि जीवन में साढ़े 27 वर्ष उपवास किये। और उनके पास शेर आकर के बैठ जाते थे। उनके शरीर पर सर्प चढ़ जाते थे। जब ऐसी कहानी माताएँ सुनाती थी तो लगता था हम भी ऐसे मुनिराज बनेंगे और उस कहानी के संस्मरणों का ये प्रभाव है कि आज हम मुनि बनकर के आपके सामने बैठे हैं ।_
संकलित अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
