जो परम आकिंचन्य बन जाते हैं वही परम सिद्ध बन जाते हैं। कनकनंदी गुरुदेव
भीलूड़ा
अभिनव श्रुत केवली वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि जो परम आकिंचन्य बन जाते हैं वही परम सिद्ध बन जाते हैं
संपूर्ण परिग्रह त्याग श्रेष्ठ है परंतु ऐसा नहीं कर पाते हैं तो भोग उपभोग त्याग करना परिग्रह त्याग हैं। भोग उपभोग के लिए प्रकृति का दोहन होता हैं। परिग्रह त्याग से पापों का संवर होता हैं। पूर्व संचित पापों की निर्जरा के लिए श्रावक के लिए दान हैं। दान स्वयं के लिए हैं। गृहस्थ के समस्त कार्य पाप के होते हैं अतः पाप को दूर करने के लिए दान दिया जाता हैं। स्व आत्म उद्धार के लिए दान हैं। ज्ञानदान से ज्ञानवान, अरिहंत, सिद्ध बनते हैं। निर्भय बनने के लिए अभय दान करना चाहिए। पर्यावरण व जीवो की रक्षा से निर्भय बनोगे। रत्नत्रय की साधना, धर्म साधना के लिए स्वस्थ रहना चाहिए। अतिथि संविभाग पंच परमेष्ठी की सेवा, वैयावृत्ति, धन का उचित सम्यक विभाग करके दान देना चाहिए। जो उपकार साधु आत्मा को परमात्मा बनाने का करते हैं उसको भूलना नहीं चाहिए। दान श्रावक का कर्तव्य है कर्तव्य ही तुम्हें अधिकार देता है। नैतिक धार्मिक आध्यात्मिक अधिकार धन का सम्यक विभाग करना है। सोला का अर्थ दान दाता के 7 गुण, नवधा भक्ति दोनों को मिलाकर सोला कहते हैं केवल वस्त्र की शुद्धि को ही सोला नहीं कहते हैं। चौका का अर्थ चार प्रकार की द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की शुद्धि को चौका कहते हैं। साधु को अतिथि कहा जाता है। अतिथि संविभाग अर्थात ओ साधु को आहार दान दिए बिना भोजन करना, पाप भक्षण करना है, हिंसक हैं। साधु त्याग करते हैं अतः उन्हें आहार दान ग्रहण करने का अधिकार है। दान से स्व पर का उपकार होता है। महावीर भगवान ने दास प्रथा को दूर किया। स्त्रियों को भोग की सामग्री माना जाता था इसे दूर करने के लिए उन्होंने नियम लिया कि जो राजकुमारी होगी, मुंडन किया हुआ होगा, बेडियो से जकड़ी हुई होगी, जिसकी आंखों में आंसू होंगे उसके हाथ से मैं आहार लूंगा चंदना सती को इसी दिशा में पाकर उन्होंने उसके हाथों से आहार लिया उसके हाथों में रुखा सुखा भोजन भी स्वादिष्ट भोजन में परिवर्तित हो गया और उसकी बेड़िया टूट गई, बहुत सुंदर राजकुमारी बन गई वह भगवान का अतिशय था।
आचार्य श्री कनक नंदी जी भी अपने ज्ञान के माध्यम से स्त्री जाति का तथा बच्चों का उद्धार करना चाहते हैं। साधु राग द्वेष को नष्ट करने के लिए बनते हैं। साधु ,उपाध्याय, आचार्य, अर्यिका अतिथि में आते हैं। उनके आने की कोई तिथि नहीं होती तथा उनको निमंत्रण आमंत्रण की भी आवश्यकता नहीं होती। मेहमानों को निमंत्रण आमंत्रण निश्चित तिथि पर देना पड़ता है। साधु सतत आत्मा से जुड़े रहते हैं अतः सतत पर्व मनाते हैं साधु पर्व व तिथि विशेष से बंधे नहीं है। सतत आत्मरूपी धर्म में लीन रहते हैं उन्हें किसी तिथि विशेष में धर्म करने की आवश्यकता नहीं होती अतः अतिथि हैं। टैक्स नहीं देने पर राज दंड पेनल्टी मिलता है वैसे ही धन का 1 बटा चार अथवा एक बटा 10 भाग नहीं देने पर कर्म दंड मिलता हैं। अतिथि संविभाग में आहार दान, उपकरण पिंछी, कमंडल, शास्त्र, पेन, पेंसिल, नोटबुक आदि देना, औषधिदान आयुर्वेदिक औषधियों को देना तथा आवास दान आदि रत्नत्रय के उपकार के लिए, आत्मा के उपकार के लिए, समय, श्रम, तन, मन, धन किसी भी प्रकार का दान देना चाहिए। संयम में तत्पर मुनि अतिथि है। श्रावक के दो मुख्य कर्तव्य में दान व पूजा हैं। दान व पूजा बिना श्रावक नहीं हैं। पूजा से भी श्रेष्ठ दान है। पंचकल्याणक, विधान, पूजा, स्तवन आदि अतिथि संविभाग का छोटा भाग है। दया सेवा सहयोग से विशेष सुख है मिलता आचार्य श्री द्वारा रचित का मंगलाचरण मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने किया।
विजयलक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
