वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री 108 विमल सागर जी महाराज जी परम प्रभाविका सुशिष्या जिन्धर्म प्रभाविका गणिनी आर्यिकारत्न 105 श्री स्याद्वादमति माताजी के समाधि दिवस पर भाव भीनी विनयांजली
हे माँ तुम्हारे चरणों में शत् -शत् नमन ।
श्रद्धा सुमन लिए करता हूँ बारम्बर वंदन ।।
नाम व व्यवहार मे था आपके ‘स्याद्वाद’ ।
इसीलिए तो माँ का जीवन रहा सदैव निर्विवाद ।।
म. प्र. की औद्योगिक, धार्मिक एवं माँ अहिल्याबाई होल्कर जैसी हट प्रतिज्ञ एवं निडर रानी की नगरी इन्दौर में कमलाबाई धन्नालाल पाटनी दम्पत्ति के यहाँ 14-5-1953 को अनेक सुलक्षणों से संयुक्त एक बालिका ने जन्म लिया नाम रखा गया ‘ ऐरावती’। बालिका ऐरावती बाल्यकाल में विलक्षण प्रतिभा की धनी थी। उन्हें सामाजिक कार्यों की अपेक्षा धार्मिक कार्यों में अधिक रूचि थी । माता-पिता के धार्मिक संस्कार मानो वे जन्म से ही आत्मसात करके आई थी । परिणामस्वरूप लौकिक शिक्षा में वीर (स्नातक) भी आपने संस्कृत भाषा मे किया। जिससे धार्मिक ग्रंथों के अध्यन अध्यापन का कार्य सुगमता से हो सके। एरावती के मन में संसार की असारता का चिन्तन प्रतिपल चलता रहता किन्तु स्वाध्याय के साथ – साथ वैराग्य की भावना प्रबल होती गई।
वैराग्य के भावों को सार्थकता प्राप्त हुई जब आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज के दर्शन हुए और आचार्यश्री ने अपने वात्सल्यमयी आंगन में आपको शिष्यत्व प्रदान कर दिया | ऐरावती की तो मानो मुँह मांगी मुराद मिल गई। वे प्रतिदिन उस क्षण का इन्तजार करने लगी कब उन्हें गुरु द्वारा दीक्षा प्रदान की जायेगी। श्री सिद्धक्षेत्र सोनागिर (दतिया) दिनांक 5-8-1979 को वह चिरप्रतीक्षित क्षण भी एरावती के जीवन में आ गया जब उन्हें आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज द्वारा क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान कर रत्नत्रय के मार्ग पर बढने हेतु प्रथम सीढ़ी प्रदान कर दी नामकरण हुआ क्षुलिका 105 श्री अनंगमति माताजी ।

जल्द ही वर्ष 1981 मार्च माह में भगवान गोम्मटेश्वर बाहुबली जी के चरणों में वह क्षण भी आ गया जब आचार्य विद्यानंद महाराज के सानिध्य में आचार्य विमलसागर जी महाराज ने आपको आर्यिका
दीक्षा प्रदान की ओर नाम हुआ आर्यिका श्री 105 स्याद्वादमति माताजी । भगवान बाहुबली की छाव आपके अटल, निश्चय व धैर्य की अनुभूति भी आचार्य श्री ने आपमें देखी होगी इस स्थान का चयन आपकी दीक्षा के लिये किया होगा। आपनेजैन आगम को अपनी लेखनी से भी समृद्ध किया, छहथाला, द्रव्यसंग्रह, रत्नकरण्ड श्रावकाचार एवं तत्वार्थ सूत्र को आपने जन सामान्य को समझाने की दृष्टि से प्रश्नोत्तर में लिखा, स्यादवाद बाल शिक्षा को 4 भागो में ,नैतिक संस्कार 3 भागो में आदि लगभग ३६ पुस्तको की रचना आपने की हैं। दीक्षा गुरू वात्सल्य रत्नाकर आचार्य श्री विमलसागरजी महाराज की 75 वी जन्मजयंती वर्ष पर 75 ग्रंथो का पुर्नप्रकाशन एवं आचार्य श्री विमलसागरजी का स्मृति ग्रंथ वात्सल्य रत्नाकर के तीनो भागों का कुशल संपादन कर आपने अपनी लेखनीय क्षमता एवं विद्वता का बखूबी परिचय दिया ।

गोम्मटगिरि इन्दौर में आचार्य भरतसागर जी महाराज ने आपके तपोबल, ज्ञान बल, एवं आत्मबल को देखते हुए आपको गाणिनी पद से विभूषित किया । आपने अपनी दीक्षा के 35 वर्षो में अनेक उपसर्ग सहते हुए अपनी निर्दोष चर्या का बखूबी पालन किया ।

पूज्य माताजी का जिनागम के प्रति अगाध श्रद्धा भक्ति और
उनके ज्ञान के आगे अच्छे अच्छे नामी विद्वान नतमस्तक थे।
आपसे अनेकों ब्रह्मचारी भाइयों और बहनों ने श्रुतज्ञान की शिक्षा ग्रहण की। और दिगम्बरत्व को धारण करके मोक्ष मार्ग की और अग्रसर हैंआप आगम की महान ज्ञाता मधुर वाणी जिनके कण्ठ में थी सरस्वती की साक्षात प्रतिमूर्ति
राग द्वेष से दूर
प्रचार प्रसार से दूर
आजकल बड़े बड़े आचार्य साधु एवं माताजी को ख्याति लाभ की लालसा देखने मे आती है ,लेकिन पूज्य माताजी को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं था ।
कोई प्रोपेगण्डा नहीं
न कोई पंथवाद
न कोई संतवाद
सिर्फ और सिर्फ आगमपंथ

अन्त मे आपने 30-9-14 आश्विन शुक्ल षष्टी(छठ) विक्रम संवत 2071 मंगलवार को सिद्ध भगवान का स्मरण करते हुए सोहम सोहम का उच्च स्वर से उच्चारण करते हुए धारूहेड़ा जिला रेवाडी हरियाणा में अपने नश्वर तन का त्याग कर समाधिमरण कर अपने जीवन रूपी मंदिर पर स्वर्ण कलश का आरोहरण कर दिया हम आपके 8 वे समाधि दिवस पर बारम्बार नमन करते है।
इस भावना के साथ-
तन से चाहे दूर हो मन से हमारे पास है।
आपके दिए संस्कारों का हमारे दिल मे वास है।।
अमल जैन भीकनगाँव जिला खरगोन मप्र से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
