जितने जितने अंश में पर को, मोह को छोड़ते जाओगे उतने उतने अंश मे आत्मा के निकट पहुंचेंगे। कनकन्दी गुरुदेव

JAIN SANT NEWS भीलूड़ा

जितने जितने अंश में पर को, मोह को छोड़ते जाओगे उतने उतने अंश मे आत्मा के निकट पहुंचेंगे। कनकन्दी गुरुदेव

भीलूड़ा

समता शिरोमणि आचार्य रत्न कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि जितने जितने अंश में पर को, मोह को छोड़ते जाओगे उतने उतने अंश मे आत्मा के निकट पहुंचेंगे। शरीर को छोड़ नहीं सकते परंतु उसको मेरा, मैं नहीं मानना है। परिग्रह को गाढ कर रखें, छिपा कर रखें, पेट में रखें कहीं पर भी रखें मरते समय साथ नहीं आने वाला है। अरिहंत भगवान का औदारिक शरीर भी अंत में नष्ट होता है तब मोक्ष होगा। शरीर को पर जानने पर भी अनावश्यक कष्ट नहीं देना चाहिए। तीर्थंकर भी साधु बनने के बाद में हजारों बार आहार लेते हैं। उनकी आयु हजारों, लाखों, करोड़ों वर्षों की काल के अनुसार होती हैं। त्याग करते हुए भोग चाहना, धन चाहना कर्म बंध के लिए कारण है। जिनवाणी ताड़ पत्र, ताम्रपत्र, कागज जिस पर भी लिखी जाती है, वह जड़ होते हुए भी पूजनीय हैं। कषाय, मोह, मूर्छा परिग्रह है। कषाय सहित कितना भी तप करें, साधु बने कभी भी अपरिग्रही नहीं बन सकते हैं। धर्म में भी परिग्रह के माध्यम से अधर्म करते हैं। त्याग से तृष्णा नहीं तृष्णा क्षीण होती है। निरपेक्ष त्याग होना चाहिए। काम ,भोग, धन, कामना नहीं होनी चाहिए। साधु भी त्याग करते हुए भी भावों में विशुद्धि नहीं, वीतरागता नहीं तो अविशुद्ध चित्त से कर्म क्षय नहीं होगा। भाव विशुद्ध नहीं, त्याग भी नाम प्रसिद्धि धन के लिए भोग के लिए है तो वह परिग्रह हैं। धर्म को जन संग्रह, धन संग्रह, प्रसिद्धि के लिए करना परिग्रह हैं। मुनिराज मान सम्मान पूजा प्रतिष्ठा आदि से विरक्त होते हैं। अचेतन परिग्रह को तो पहले ही छोड़ देते हैं परंतु मुनि अवस्था में शिष्य, पिच्छी, कमंडलु, पंचकल्याणक, प्रतिष्ठा मूर्ति निर्माण, मंदिर निर्माण, जीर्णोद्धार से रहित भाव ही आकिंचन्य धर्म हैं। शरीर आदि से भी निर्ममत्व होने से मोक्ष पद की प्राप्ति होती हैं। जो प्रमादी नहीं वह अपरिग्रही हैं। जब स्वगुण अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख आदि पर विश्वास करेंगे तब अपरिग्रही बनेंगे। ऐसा चिंतन करने से अतुल वैभव सुख प्राप्त भी हो तो भी उसमें लिप्त नहीं होने से सम्यक दृष्टि ,अपरिग्रही होंगे। आत्मा के स्वभाव को छोड़कर सब परिग्रह है। इंद्र, नागेंद्र, चक्रवर्ती आदि से भी अधिक सुख ध्यान करने वाले मुनिराज को होता हैं। जो निस्पृह, शांत, वीतरागी होते हैं। आत्म वैभव सांसारिक वैभव तथा इंद्र के वैभव से अनंत गुना श्रेष्ठ है। आत्मवैभव से युक्त केवली भगवान परीग्रही नहीं है। आसक्ति ही परिग्रह हैं। मैं ज्ञायक स्वरूप हूं, शुद्ध ,बुद्ध ,आनंद हूं, ज्ञाता, दृष्टा, मेरा शुद्ध स्वभाव भगवान का स्वरूप जैसा है, मैं ना वस्त्र हूं, मैं किसी का पति किसी की पत्नी नहीं, मैं मेरा आत्मा का पति हूं।

इस बेला में मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने अपरिग्रह पुण्य परिग्रह पाप कविता द्वारा मंगलाचरण किया। सागवाड़ा तथा पुनर्वास कॉलोनी की आनल टीना ज्योति आदि ने भी अपने अनुभव बताए।

विजयलक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी

संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी

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