त्यागी को देखकर मिलती है त्याग की प्रेरणा -एक श्रेष्ठ साधक किस तरह अन्य साधक के लिए आदर्श प्रेरणा बनता है व श्रेष्ठ साधक में साधर्मी साधक के प्रति अथाह वात्सल्य व स्नेह का सत्य प्रसंग जो समूचे जगत के लिए अनुमोदनीय है
*युग श्रेष्ठ आचार्य शिरोमणी तपस्वी सम्राट श्री सन्मति सागर जी ऋषिराज* जिनके ब्रह्मचारी अवस्था से नमक व शक्कर के त्याग हो चुके थे,सन 1962 सम्मेद शिखर जी में मुनि दीक्षा के पश्चात क्रमश तेल,घी व दही के भी त्याग कर दिए। ऐसे महात्यागी आचार्य श्री सन्मति सागर जी ने 1975 में कोलक्तता वर्षायोग में आजीवन अन्न के भी त्याग कर दिए।इस तरह आजीवन अन्न व पंच रस त्यागी गुरुदेव प्रायः वर्षायोग में दूध का भी त्याग कर देते थे।
आचार्य श्री के त्याग की महिमा को *उनके अनुज गुरुभाई स्थिवराचार्य श्री संभव सागर जी* सन 1967 से लेकर 1972 तक करीब से देख चुके थे। अनेक वर्षों पश्चात पुनः मिलन हुआ जब सन 1998 में तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर जी का शिखर जी में मंगल प्रवेश हुआ जहा पर स्थिवराचार्य श्री संभव सागर जी,आचार्य श्री भरत सागर जी,आचार्य कुमुदनंदी जी,आचार्य शीतल सागर जी व आचार्य तप सागर जी सहित 80 से अधिक संतो ने उनका भव्य स्वागत किया।
यहां आचार्य श्री संभव सागर जी अपने गुरु समान अग्रज तपस्वी सम्राट के तप त्याग से अत्यंत प्रभावित हो रहे थे।उन्ही से प्रभावित होकर सन 1998 में शिखर जी में आचार्य श्री संभव सागर जी ने जब तपस्वी सम्राट का विहार होने वाला था तब आजीवन अन्न व छः रसों का त्याग कर दिया। यह खबर जब तपस्वी सम्राट को ज्ञात हुई तो वे सीधे अपने गुरु भाई अनुज आचार्य श्री संभव सागर जी के पास आए और बोले संभव सागर जी आपने आजीवन अन्न व छः रसों का त्याग क्यों कर लिया।
जवाब में प्रति प्रशनात्मक संभव सागर जी बोले – आपने क्यों त्याग किए? जब आप त्याग कर सकते हो,कुशलता से व्रत निभा सकते हो तो मैं भी निभा लूंगा।
अपने अनुज के दृढ़ संकल्प को तपस्वी सम्राट अच्छी तरह से समझ चुके थे और गर्वित होकर उन्हें शुभाशीष दिया साथ में तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर जी ने आचार्य श्री संभव सागर जी के संघस्थ सबसे होनहार सेवाभावी मुनि श्री मोक्ष सागर जी को आज्ञा पूर्वक बुलाकर नियम दिया कि मोक्ष सागर जी आपको आज से लेकर संभव सागर जी के समाधि तक संघस्थ साथ में रहते हुए सेवा वैयवृत्ती का पूर्ण दायित्व निभाना है। मैं आपको संभव सागर जी की जीवन पर्यन्त संघस्थ रहते हुए सेवा वैयवृत्ती का नियम देता हु। मुनि श्री मोक्ष सागर भी सहर्ष अपने दादा समान गुरु से सेवा का महान नियम पाकर धन्य हो गए।
तपस्वी सम्राट द्वारा मुनि श्री को इस तरह के नियम देने के पीछे साधर्मी साधक अपने अनुज के प्रति असीम स्नेह व वात्सल्य भरा हुआ वैयावृती का भाव समाया हुआ था। जो सबके लिए प्रेरक, अनुमोदनीय व वंदनीय है। इस घटना के लगभग 25 वर्ष हो चुके है।
वर्तमान में विराजित संतो में सबसे वरिष्ठ संत के रूप में आचार्य श्री संभव सागर जी गुरूराज आजीवन अन्न -छः रसों के त्याग के साथ शिखर जी में साधनरत हैं।जिनकी सेवा में सदैव मुनि श्री मोक्ष सागर जी तत्पर है।इसी श्रंखला में विगत वर्षो में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी गुरुदेव का शिखर जी में मंगल आगमन हुआ जिन्होंने आचार्य श्री संभव सागर जी से नियम व शुभाशीष लेकर सिंह निष्कृडीत जैसे अत्यंत कठोर महाव्रत की साधना सुचारू है।
जिसमे 567 दिन के अखंड मौन व्रत में 496 दिनों का निर्जला उपवास है।
अंतर्मना स्वामी के संघस्थ युवा मुनि श्री पीयूष सागर जी भी आचार्य श्री संभव सागर जी ऋषिराज की तप त्याग से प्रभावित होकर उनके शुभाशीष से अन्न का त्याग कर चुके है।
अर्थात त्यागी की संगति से त्याग की प्रेरणा मिलती है जो आत्मकल्याण देता है और भोगी की संगति से भोग की भावना बढ़ती है जो भव भावांतरो तक रोग,शोक व दुःखो को देने वाला है।
उपरोक्त समस्त प्रसंग मेने हाल ही सितंबर 2022 की शिखर जी यात्रा के दरमियान त्रिकाल वंदनीय आचार्य श्री संभव सागर जी ऋषिराज के प्रवचन में सुनकर प्रेषित किया है।
*मेरी शिखर जी यात्रा के झरोखे से*
शब्दसुमन – शाह मधोक जैन चितरी
