आत्मा में लीन हो जाना ही ब्रह्मचर्य धर्म है- गुरु विशल्य सागर महाराज

JAIN SANT NEWS झुमरीतिलैया

झुमरीतिलैया (कोडरमा)। दशलक्षण पर्व के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी का पर्व शोभा यात्रा और भगवान के जयकारे के साथ जैन संत गुरुदेव विशाल सागर जी के सानिध्य में मनाया गया। बड़ा मंदिर डॉक्टर गली से नगर भ्रमण शोभा यात्रा निकाली गई। वासुपूज्य भगवान को पालकी में बैठा कर भक्तजनों ने नगर भ्रमण कराया। महिलाएं, पुरुष, बच्चे सभी केसरिया और श्वेत वस्त्र में पैदल चल रहे थे। जैन समाज के भजन सम्राट सुबोध गंगवाल ने अपने भजनों से लोगों को आनंदित कर दिया। भगवान महावीर और पार्श्वनाथ और गुरुदेव विशल्यसागर जी के जयकारे से पूरा शहर गुंजायमान हो गया। रास्ते में जगह-जगह तोरण द्वार बनाए गए। लोगों ने रास्ते में भगवान और गुरुदेव की आरती की। नया मंदिर, पानी टंकी रोड में शोभा यात्रा समाप्त हुई, जहां विश्व शांति मंत्रों से युक्त लौंग की माला लेने का सौभाग्य सुरेश, नरेंद्र, सिद्धार्थ, अरिहंत, प्रेम, बीना, निधि, जियान झांझरी परिवार को मिला। आज प्रातः भक्तजनों ने “उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म ” मनाया। अनंत चतुर्दशी की पूजा, भगवान वासुपूज्य का मोक्ष कल्याणक बड़े ही धूमधाम से जैन संत गुरुदेव विशल्य सागर जी के मंगल सानिध्य में मनाया गया। विशल्य सागर गुरुदेव ने अपनी पीयूष वाणी में भक्तजनों से कहा कि आत्मा में लीन हो जाना ही ब्रह्मचर्य धर्म है। जब मनुष्य अपने आप में लीन हो जाता है, जहां पर किसी प्रकार की विकृति नहीं होती है, साधना की परम अनुभूति का अनुभव होता है, वही ब्रह्मचर्य है। जैन दर्शन में ब्रह्मचर्य का श्रेष्ठ स्थान है। इसके बिना सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। जहां ब्रह्मचर्य है, वहीं समस्त सिद्धियों का आधार स्थल है, वहीं ईश्वर है। जो जीवन दूर से ही स्वर्णिम चमकता दिखाई देता है, वही जीवन श्रेष्ठ है। बिना ब्रह्मचर्य के भगवान नहीं बना जा सकता। ब्रह्मचर्य धर्म वासना से नहीं, साधना से सिद्ध होती है। भारत देश वासना से नहीं, साधना के कारण विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। यहां तीर्थंकर ऋषि-मुनियों ने जन्म लिया है। अध्यात्म संस्कृति ही हमारी संस्कृति है। रावण अपनी वासना के कारण बदनाम हुआ, परंतु भगवान राम का इतिहास शील और वात्सल्य से सुसज्जित था। जिसके कारण वह सभी के प्रिय बनते गए। पाश्चात्य संस्कृति जीवन को दुर्गति की ओर ले जाती है। आज के युवाओं को इससे बचने की आवश्यकता है। कीचड़ में कमल की तरह खिल जाना ही हमारे जीवन की विशेषता है। भोग से योग में जीवन लगाना ही सबसे बड़ी साधना है। मन को जीतने वाला ही ब्रह्म में पहुंच सकता है। ब्रह्मचर्य के पथ पर चलने के लिए चार सूत्र को हमेशा ध्यान रखें, स्वस्थ मानसिकता होनी चाहिए, इंद्रियों पर नियंत्रण होना चाहिए, अच्छी संगति होनी चाहिए और ईश्वर की भक्ति आराधना में ध्यान लगाना चाहिए। मित्र ऐसा हो, जो मंदिर की ओर ले जाए, मदिरालय की ओर नहीं। इससे पहले प्रात: जैन संत गुरुदेव विशल्य सागर जी के मुखारविंद से नया मंदिर जी में महा शांति धारा का पाठ किया गया। भगवान की शांति धारा का सौभाग्य प्रदीप, पीयूष, राहुल, युगांत, आर्जव छावड़ा परिवार, अजय कुणाल काला परिवार, मुरलीधर, जुगल किशोर, संदीप, संजय, आशीष, अक्षय सेठी परिवार, मूलचंद, सुशील राज, सुनील छाबड़ा परिवार। बड़ा मंदिर जी में बुंदेला ग्रुप के सिद्धार्थ, सुमित, आशीष, विनीत, ऋषभ परिवार, मूल वेदी में चतुर्वेदी ग्रुप के कुणाल, अक्षय, प्रशम, ऋषभ परिवार को सौभाग्य मिला। नया मंदिर में दीप प्रज्ज्वलन, शास्त्र भेंट, चरण प्रक्षालन का सौभाग्य चुन्नीलाल प्रदीप छाबड़ा परिवार को मिला। कार्यक्रम के संयोजक सुरेंद्र काला और समाज के पदाधिकारियों, महिला समाज, जैन युवक समिति, समाज के मीडिया प्रभारी नवीन जैन राजकुमार अजमेरा ने सभी व्रत धारियों के व्रत की अनुमोदना की और बधाई दी। रत्नत्रय व्रत करने वाले मंत्री ललित सेठी, प्रियंका छाबड़ा, विद्या देवी सेठी, पारस सेठी को गुरुदेव विशल्य सागर जी ने आशीर्वाद दिया। यह जानकारी जैन समाज के मीडिया प्रभारी नवीन जैन और राजकुमार अजमेरा ने दी।

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