विश्व मैत्री दिवस
(लिखित– श्रमण मुनि विशल्य सागर )
“क्षमा की वीणा से सब की पीड़ा हरना क्षमावाणी पर्व है”
मकान को मजबूत करने के लिए नीव की मजबूती जरूरी है धर्म को हृदय में जागृत करने के लिए श्रद्धा आस्था अत्यंत आवश्यक है और पर्व की पराकाष्ठा पर खरा उतरने के लिए क्षमा धर्म का पालन करना जरूरी है नीव अगर कमजोर होती है तो कभी-कभी हवा के झोंके से सुंदर से सुंदर इमारत जमीन पर गिर कर ध्वस्त हो जाती है, उसी तरह सब धर्मों का पालन करने के साथ-साथ क्षमा धर्म का गुण जीवन में नहीं समाया तो सारे पर्वों पर एक क्षण में ही पानी फिर सकता है,

आचार्य कुंदकुंद स्वामी ने कहा है-
” वत्थू सहाव धम्मो खमाधि भावेन परीनदो धम्मो”
वस्तु का स्वभाव धर्म है अग्नि का स्वभाव उष्णता है, जल का स्वभाव शीतलता और धर्म में परिणिती आत्मा का स्वभाव क्षमा धर्म है इंसान जब अपने स्वभाव को धर्म ने परिणत कर देता है तो उसका जीवन क्षमा वान हो जाता है, जिस प्रकार उष्णता के बिना अग्नि और शीतलता के बिना जल की संभावना नहीं की जाती, उसी प्रकार क्षमा के बीना आदमी की पहचान नहीं हो पाती,! क्षमा आत्मा का स्वभाव है यह किसी से मांगने और किसी को देने की वस्तु नहीं है वह तो अंतरंग में सोए हुए भावों को जगाता है परेशान और पीड़ित इंसान के घाव को भरता है,क्षमा वाण ही इस पृथ्वी से कुछ समय के बाद अपने आप ऊपर की ओर उ भारता है क्षमा करना कायरता नहीं बल्कि वीरता है ,क्षमा वीरो का आभूषण है क्षमा वीरो की शोभा है क्षमा महावीर की संपदा है क्षमा इस पृथ्वी की महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिस प्रकार मनुष्य जीवन के लिए जितना प्रेम जरूरी है उतना ही क्षमा आवश्यक भूमिका अदा करती है, ध्यान रखना मैत्री और क्षमा हमारे जीवन रूपी रथ के दो पहिए हैं क्योंकि विश्व मैत्री का शुभारंभ मैत्री से ही होता है मेरी भावना में कहा भी गया है
मैत्री भाव जगत में मेरा सब जि वो से नित्य रहे
दीन दुखी जीवो पर मेरे ऊर से करुणा स्रोत बहे !
क्षमा से ही मनुष्य को सुख शांति और निर्भयता की प्राप्ति होती है कहां है मनुष्य की शोभा रूप से है रूप की शोभा गुण से है गुण की शोभा ज्ञान से है और ज्ञान की शोभा क्षमा से है, क्षमा ही आत्मा का स्वभाव है पानी को अग्नि में कितना भी तपाया जाए कुछ समय पश्चात शीतल हो जाता है, व्यक्ति को कितना ही क्रोध दिलाया जाए लेकिन थोड़ी देर बाद स्वयं ही शांत हो जाता है क्योंकि कोई भी इंसान 24 घंटे क्रोध नहीं कर सकता यदि उसके भीतर 24 घंटे क्रोध भरा रहता है तो 25 वा घंटा उसकी मौत का कारण बन जाता है ! इसलिए धार्मिक आचरण को व्यक्ति के भीतर समाहित करने के लिए प्रकृति ने मनुष्य को शांत स्वभा वी बनाया है
क्षमा आत्मा की भाषा है क्षमा की भाषा सर्वोपरि है व्यक्ति को कभी भी क्रोध से नहीं जीता जा सकता ,क्षमा के द्वारा ही दुश्मन के मन को परिवर्तित किया जा सकता है, ध्यान रखना कभी भी आग से आग को नहीं बुझाया जा सकता है आग को बुझाने के लिए क्षमा रुपी जल की जरूरत होती है, इस क्षमा रुपी जल से क्रोध से जला हुआ इंसान भी नतमस्तक हो जाता है ,संतों की साधना को बल देने के लिए प्रतिक्रमण में पाठ आया है उस प्रतिक्रमण के दौरान जैन संत कहते हैं
खम्मामि सत्व जीवानम- सत्वे जीवा खभंतु में ! मित्ती में सव्व भूदेतू, वेरम मजझनम केन वि” !! इस पाठ को पढ़कर मैं एक इंद्रिय से लेकर पंचइंद्रिय तक के जीवो से क्षमा चाहता हूं, और सभी जीव क्षमा दान करें, सभी जीवो से मेरी मित्रता है, किसी भी जीव से मेरा बैर भाव नहीं है! इस गाथा में व्यक्ति विशेष, जाति विशेष, संप्रदाय विशेष से क्षमा नहीं बल्कि समष्टि से स्मरण करते हुए सभी जीवो से क्षमा याचना की गई है!
क्षमा सिर्फ हाथ जोड़कर नहीं हृदय से होना चाहिए, हाथ जोड़कर की गई क्षमा माफी कहलाती है, और हृदय से की गई क्षमा आत्मीयता दर्शाती है,
स्वयं को क्षमा करने वाला ही जगत को क्षमा करता है ,तभी तो उत्तम क्षमा के धनी तीर्थंकर वर्धमान वर्तमान जगत के लिए वरदान सिद्ध हुए ,क्षमा की वीणा से सब की पीड़ा का परिहार करना क्षमावाणी पर्व है
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमण्डी
