कहा, इच्छाओं को जीतना ही तप
आर्यिका रत्न 105 श्री नन्दीश्वरमति माता जी एवं विशेष मति माताजी ने बताईं विशेषताएं
जोबनेर। दसलक्षण पर्युषण महापर्व के सातवें दिन उत्तम तप लक्षण के अवसर पर आर्यिका रत्न 105 श्री नन्दीश्वरमति माता जी एवं विशेष मति माताजी ने तप धर्म की विशेषता समझाते हुए बताया कि दशलक्षण महापर्व का सातवां लक्षण उत्तम तप धर्म है। इच्छाएं जीवन को कठिन बनाती हैं। इच्छाओं को जीतना ही तप है। जैन धर्म में तप की महिमा को अपरम्पार माना गया है। ज्ञान, दर्शन,चारित्र और तप के मार्ग का अनुगमन करते हुए जीव सुगति को प्राप्त करता है। निर्जरा का प्रमुख साधन है- तप। तप कर्मों का नाश करता है, तप जग से सभी जीवों को उबारता है। जो 12 प्रकार के तपों को तपता है, वह शीघ्र ही परम पदवी को प्राप्त करता है।
मिक्की बड़जात्या ने बताया कि चैत्यालय जी में मण्डल विधान में आज की शांतिधारा, प्रथम अभिषेक, चन्दन लेपन एवं सांयकाल महाआरती का सौभाग्य श्री महावीरप्रसाद, शांतिलाल, दीपककुमार, महेंद्र कुमार गंगवाल चारणवास वालों को प्राप्त हुआ। सायंकाल को इनके निवास स्थान से बैंडबाजे के साथ महाआरती में सम्मिलित होने सम्पूर्ण समाज के स्त्री- पुरुष नाचते गाते हुए चैत्यालय जी में पहुंचे। तत्पश्चात माताजी की आरती हुई एवं रात्रिकालीन संस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न हुए।
