तप का मतलब जो करने योग्य था उसको भी कम कर दिया* सुधासाग़र महाराज

JAIN SANT NEWS ललितपुर

तप का मतलब जो करने योग्य था उसको भी कम कर दिया सुधासाग़र महाराज

ललितपुर –

जो वस्तु अहितकारी है उसे छोड़ दो ये ठीक है ना। गलत को छोड़ना है जो अच्छी है उन्हें कम जानों पहले कहा था अच्छी चीजों को जानों फिर कह दिया कि अच्छे लोगो से भी सम्पर्क कम करों मां बाप के बिना कितनी देर रह सकता है एक दो दिन या पुरी जिदंगी अकेला रह सकता हो तो मुनि महाराज बन जाओ। ये है उत्तम तप धर्म । तपस्वी को गुरु कहां गया है जो तप करते हैं तप है कि नहीं हमारे गुरु तपस्वी कहा है मेरे गुरु तप के भंडार है तप का मतलब जो करने योग्य था उसको भी कम कर दिया मनुष्य बाल्य काल फिर सौलह साल तक शिक्षा पाकर योग्यता को प्राप्त होता है वहीं धर्म क्षेत्र में आठ वर्ष अंतरमूर्हत वाद दीक्षा ग्रहण कर सकता है कल उत्तम संयम धर्म था जिसमें अनुशासन की बात कही थी संयम कहता है कि सही रास्ते पर चले सही बोलो सही चलो सही कमाओ संयम धन कमाने की मनाई नहीं करता बस इतना कहता है कि सही कमाओ कमाने के बाद। सुकून से बैठ सको डाकू धन कमाने के बाद भागता फिरता है ऐसा किसी को ना करना पड़े। यह उदगार श्रावक संस्कार शिविर को संबोधित करते हुए मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज ने ललितपुर व्यक्त किए

*एक सौ से अधिक शिविरार्थी कर रहे हैं दस उपवास*
मध्यप्रदेश महासभा के संयोजक विजय धुर्रा ने कहा कि प्रथम श्रावक संस्कार शिविर ललितपुर से ही 29 वर्ष पूर्व प्रारंभ हुआ था। जब इसमें एक सौ इक्तीस शिविरार्थी बैठे थे। आज लगभग तीन हजार शिविरार्थी है। इस शिविर के माध्यम से एक सौ शिविरार्थी जल के साथ दस उपवास की तपस्या कर रहे हैं। वहीं कुछ शिविरार्थी कठिन तपस्या कर रहे हैं।

इसके साथ ही पांच उपवास चार उपवास करने वालों बड़ी संख्या है।

श्रावक संस्कार शिविर के निर्देशक हुकम काका समस्त व्यवस्था को सुदृढ़ करने लगतार सभी प्रमुखो के साथ मिलकर सम्पूर्ण व्यवस्था को प्रतिदिन अंतिम रूप दे रहे हैं।

*झांडु का अनुशासन*

मुनिश्री ने कहा कि-भारत देश की विशेषता तो है ही जैनियों की भी विशेषताएं होती हैं विवेकानंद जी विदेश में संबोधित करते हुए कहा माताओं व बहनों कहा तो लोग हंसने लगे मां भी अनेक हों सकते हैं तो विवेकानंद जी कहते हैं कि हमारे यहां तो धरती को भी माता कहकर पूजा जाता है। ये भारतीय संस्कृति जैनी के यहां तो धन का संयम,वस्त्र धोने का संयम हो। यहा तक झाड़ू लगाने को संयम है। जो तुम्हारे लिए योग्य हों वह सब करों जो तुम्हारे योग्य नहीं है उसे छोड़ों।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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