प्रतापगढ़ । केवल मंदिर में आना धर्म नहीं है। मंदिर में आकर पूजा करना क्रिया मात्र है। जब तक उसमें भाव नहीं है, यह पूजा व्यर्थ है। आपका मंदिर में आकर इस थाली से आकर उस थाली में द्रव्य चढ़ाने का कोई अर्थ नहीं है। जो भगवान निरंजन हैं, उन्हें आपके जल चढ़ाने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें आपके भाव चाहिए। यह बात आचार्य सुंदर सागर जी महाराज ने प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि भक्ति, मुक्ति देती है, परिणाम में निर्मलता लाने की जरूरत है। यह हमारा भाग्य है कि हमें देव, शास्त्र, गुरु मिले हैं। एक मुनिराज बीमार भी होते हैं, तब भी वे अपनी क्रियाएं नहीं छोड़ते। वहीं आपको जरा सा भी बुखार आ जाए तो गुरुदेव के प्रवचन सुनने आने की हिम्मत नहीं करते। अपने प्रकृति को कषाय रहित रखना ही आर्जव धर्म कहलाता है। हमें बाहर की खुशी को नहीं मानना चाहिए, खुशी तो अंदर से आती है। आपको पुरुषार्थ करके जैन धर्म मिला है, दशलक्षण पर्व मनाने का सौभाग्य मिला है तो इसे अपनी खुशी मानें।
