श्री महावीर जी। सारा संसार विषय और कषायों से भरा हुआ है, अनादि काल से आप कितने भवों में भ्रमण कर रहे हैं। विषय और कषाय हितकारी नहीं हैं, इसलिए आप दुखी हैं। यह मंगल देशना वात्सलय वारिधि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी ने पर्युषण पर्व पर साधना शिक्षण शिविर में प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म पर प्रकट की।
आचार्य श्री ने भगवान पार्श्वनाथ और कमठ के जीवों के पूर्व पर्याय का उल्लेख कर बताया कि कमठ ने हर पर्याय में पारसनाथ भगवान पर उपसर्ग किया।किंतु भगवान ने हमेशा क्षमा भाव रखा। उन्हें शांति, साधना, संयम से मोक्ष मार्ग मिला। क्षमा बहुत बड़ा धर्म है। हमें उत्तम क्षमा को धारण करना चाहिए। भगवान कहते हैं कि उपसर्ग सहन करके ही क्षमा भाव धारण करना चाहिए। क्षमा में अजेय शक्ति है। जिस जिस ने क्रोध का जहर पिया है, उसे क्षमा रूपी अमृत का पान करना चाहिए। तभी हम आत्मा को अजर-अमर बना सकते हैं।
पर्युषण पर्व के बारे में आचार्य श्री ने बताया कि यह वर्ष में 3 बार आता है। भादो माह में फुर्सत के दिन होते हैं। इसलिए श्रावक इसे विशेष उत्साह के साथ मनाते हैं। आचार्य श्री ने बताया कि माघ माह चैत्र माह और भादो माह में 10 लक्षण पर्व आते हैं। इसके पूर्व आपने 16 कारण की पूजा की है,16 कारण की पूजा से तीर्थंकर नाम कर्म का बंध होता है। इसलिए पर्युषण पर्व के पूर्व 16 कारण का पर्व आता है। इस महापर्व को धरोहर बना कर संभाल के रखें। आत्मा में विभाव परिणति है, इस कारण चारों जातियों में जीव दुख पाता है। आचार्य श्री ने रक्षाबंधन महापर्व का भी उल्लेख किया, जिसमें विष्णु कुमार मुनि ने 700 मुनि राज् की रक्षा की। इस कारण रक्षाबंधन पर्व मनाया जाता है। आचार्य श्री ने बताया कि देव, शास्त्र, गुरु हमारे आराध्य देव हैं। इनसे ही हमें संसार से पार होने का मार्ग मिलता है। देव हमारे हृदय में विराजमान होना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा कि जब आप पूजा करते हैं, तब आप स्थापना में देव को आमंत्रित करते हैं और विसर्जन में देवताओं को विदा करते हैं। जबकि देव, शास्त्र, गुरु आपके हृदय में हमेशा विराजमान होने चाहिए। क्षमा पर्व मुनि राज के हैं। किंतु श्रावक भी इसका पालन कर सकते हैं। उत्तम क्षमा धारण करने के लिए बहुत ही शक्ति चाहिए। सब मुझे क्षमा करें। जगत के प्राणी मात्र के लिए मैत्री भाव होना चाहिए। क्षमा का विरुद्ध क्रोध है। हमें क्षमा से क्रोध को समाप्त करने का संदेश उत्तम क्षमा पर्व देता है।
दशलक्षण महापर्व है। इसकी आप प्रतीक्षा करते हैं, चर्चा करते हैं, पर्युषण आ रहा है, आ गया है और चले गया। 355 दिन प्रतीक्षा करते हैं 10 दिन बाद पर्व चले जाता है। और हम क्या प्राप्त करते हैं, हम क्या जीवन में परिवर्तन लाते हैं, यह सोचने की बात है कु महापर्व को आप भूलें नहीं।
पूनम दीदी, दीप्ति दीदी, राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा कि आज गृहस्थ अवस्था में भी भाई-भाई, पति-पत्नी, सास-बहू में क्षमा भाव नहीं रहता है। एक-दूसरे पर क्रोध करते हैं। क्रोध से जीवन में दुख मिलता है। यदि आपको शाश्वत सुख प्राप्त करना है तो क्षमा भाव को धारण करना होगा। उत्तम क्षमा पर्व यह संदेश देता है कि आत्मा से विकृति विकारों को दूर करें और परमात्मा पद को प्राप्त करें। अनादिकाल से मानव ने कषाय को धारण किया है। इस कारण दुखी है। आप अतिशय क्षेत्र महावीर जी में आचार्य गुरुओं के सानिध्य में दशलक्षण पर्व मना रहे हैं, शिविर में भाग ले रहे हैं, यह आपका विशेष पुण्य है। जीवन में विकृति दूर करें और परमात्मा को प्राप्त करें। यही उत्तम क्षमा धर्म का मूल संदेश है। क्षमा धर्म की महानता यही है कि यह दशलक्षण के प्रथम दिन भी और अंतिम दिन भी क्षमावाणी के रूप में रहता है।
श्री अतिशय क्षेत्र महावीर जी में वर्द्धमान सभागर में प्रातः भगवान श्री महावीर स्वामी का पंचामृत अभिषेक, साधना -संस्कार शिविर के शिविरार्थियों और श्रावक-श्राविकाओं ने किया। इसके बाद नित्य नियम पूजन पंडित मुकेश जैन, महावीर जैन एवं अजय पंचोलिया सनावद तथा संगीता पाटोदी सनावद द्वारा मधुर संगीत के साथ कराया गया। प्रतिदिन सुबह पंचामृत अभिषेक, नित्य नियम, दशलक्षण धर्म की पूजन, आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी की मंगल देशना आहारचर्या, दोपहर को सामयिक, इसके बाद तत्वार्थ सूत्र का विवेचन आचार्य श्री एवम संघस्थ साधुओं द्वारा किया जा रहा है। शाम को मंगल आरती की जाती है।
