दूसरों पर करुणा करना ही धर्म है आर्यिका विज्ञा श्री
निवाई
श्री शांतिनाथ दिगम्बर अग्रवाल जैन मंदिर निवाई में प्रातः अभिषेक, शांति धारा बाद अष्टद्रव्यों से पूजा हुई कार्यक्रम के बारे जैन समाज के मीडिया प्रवक्ता राजाबाबू गोधा ने अवगत करवाया की आर्यिका श्री ने भरी धर्म सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि दया आदि शब्द क्रिया परक थे, करुणा भाव परक शब्द है ,भावना की अपेक्षा से करुणा शब्द कहा जाने लगा ,जब-जब भी दूसरों को दु:खी देखकर के तुम्हारे मन करुणा से भर जाये तो तुम समझो कि तुम धर्मात्मा हो। जिससे मन में करुणा का भाव नहीं आ रहा है तो वह अभी धर्म से दूर है ,चाहे भले ही अन्य धार्मिक कार्य भी करता है।
इनके उपरान्त एक नया शब्द और प्रयोग में आया कि यदि दूसरों को देखकर कि तुम्हारे हृदय में कम्पन होता है दु:ख के साथ साथ हृदय कम्पायमान होता है तो समझो वह अनुकम्पा नामक गुण भी धर्म है ,फिर आया कि यदि तुम दूसरों का हित करने की भावना रखते हो तो वह कहलायी दया दृष्टि।फिर शब्द आया कृपा दृष्टि जिसके मन में करुणा का भाव रहता है कहा गया “रहम दिल” तो यह शब्द अच्छे शब्द है धर्म के लिए प्रयोग किये जाने वाले शब्द है। फिर वे व्यक्ति जिनके पास इन सब शब्दों कि व्याख्या नहीं थी तो उनके लिऐ सीधे सीधे कहा की एक दूसरे का उपकार करो ये धर्म है परहित करना भी धर्म है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
