विचारों जरा , हम नहीं फसाते , तुम फंसे हुए ये बताते है ज़रा…
रावतभाटा
अभी जीव संसार के बंधन में फसा हुआ है। घर उसका कारागृह है, उसकी देवी उसकी बेड़ी है और परिवार जन रखवाले। हे जीव तू समझ जा यही सत्य है घर पर रह कर आज तक किसी का कल्याण नहीं हुआ है। आत्म ब्रह्म ही सत्य है। इसको जाने बिना किसी का कल्याण संभव नहीं है। संसार में सभी फसाने वाले है छुड़ाने वाले मात्र गुरु है, सत्य को जाने और इसे जानने के बाद ही असली आनंद आएगा यह बात श्रमण मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कही। मुनि श्री ने प्रातः काल में धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि चोरी हिंसा है, चोरी करने वाले को हिंसा पाप का बंध होता है व जो चोरी करता है उसके व्रत नियम निष्फल हो जाते है। जो वस्तु हमें किसी के द्वारा दी नहीं गई है व हमने उसे ग्रहण किया है तो हमें चोरी का दोष लगता है। हमें दूसरों की गिरी, पड़ी वस्तु को ग्रहण नहीं करना चाहिए और ना उसका दान करना चाहिए।
हमारी संपत्ति भोगने वाला, इसका दुरुपयोग करता है तो इसका कर्म बंध संपत्ति मालिक को होगा
साथ ही मुनि श्री ने कहा कि हमें हमेशा निज की वस्तु का दान करना चाहिए दूसरों की वस्तु का नहीं। हमें दूसरों के बारे में नहीं सोचना है, हमें निज का चिंतन करना है ना कि पर का। हमें पहले स्वयं की संपत्ति को ठिकाने लगाना है दूसरे की नहीं, तो उसके बारे में विचार भी नहीं करना है। हम जीवन भर कमा रहे है और हम एक दिन कमा कर चले जाएंगे। हमारी सम्पत्ति को भोगने वाला कोई और होगा। यदि उसने इस संपत्ति का सही उपयोग नहीं किया तो इसका कर्म बंध तुम्हें ही होगा और दुख दायक होगा।
तीर्थंकर भगवन के जन्म – मरण का सूतक नहीं लगता पर मनुष्य के जन्म-मरण का लगता है
मुनि श्री ने धर्म सभा में श्रोताओं से कहा कि जब तीर्थंकर भगवन का जन्म – मरण होता है तब सूतक नहीं लगता है क्योंकि वे शुभ कार्य करने वाले है। जब मनुष्य का जन्म – मरण होता है तब सूतक लगता है क्योंकि वह अशुभ कार्य को करने संसार में आता है। एक बार विवेक से जिए और यह विचार करें कि अब हमें किसी को सूतक नहीं देना है ना लगाना है। जैसा शरीर है वैसा ही पैसे है जब आता है तब भी चैन नहीं और जब जाता है तब भी चैन नहीं है, यह जीवन भर चैन से बैठने नहीं देता।
प्रातः कालीन प्रवचन में रावतभाटा श्री समाज के सभी पुरुष, महिला, बालक-बालिकाएं व गुरु भक्त उपस्थित रहे।
