धर्म से जुड़कर ही व्यक्ति संयमित हो पाता है अक्षय सागर जी महाराज

JAIN SANT NEWS गुना

धर्म से जुड़कर ही व्यक्ति संयमित हो पाता है अक्षय सागर जी महाराज

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पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के  उन्होहैनें कहा कि धर्म ही व्यक्ति को संयम के मार्ग की ओर जोड़ता है। धर्म से जुड़कर ही व्यक्ति संयमित हो पाता है। उन्होनें कहा साधना के मार्ग पर ही चलकर ही व्यक्ति धर्म के मार्ग पर अग्रसर होता है। और जब तक व्यक्ति के जीवन में संयम नही आता तब तक व्यक्ति का जीवन शुद्ध नही हो सकता यदि व्यक्ति को अपना जीवन शुद्ध बनाना है तो संयमित होना होगा और संयम के लिए धर्म को अपनाना अत्यंत आवश्यक है।

मुनि श्री ने विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि राज व्यक्ति को अपने जीवन में समता अवश्य धारण करना चाहिए। क्योंकि क्षमता ही व्यक्ति के जीवन का सर्वश्रेष्ठ धर्म है उदाहरण देते हुए बताया कि कर्मों के उदय को स्वीकार करना ही आध्यात्मिक विद्या कहलाती है और कर्मों के उदय से मन में समता भाव रखकर समता के साथ सहन करना ही मनुष्य के लिए सर्वश्रेष्ठ धर्म हुआ करता है।

उन्होंने पारसनाथ भगवान का उदाहरण देते हुए सभी भक्तों को बताया कि पार्श्वनाथ भगवान को 10 भवो तक उपसर्ग हुआ था। लेकिन उन्होंने उस उपसर्ग का सामना समता भाव के साथ शांत रहकर किया प्रतिउत्तर उन उपसर्गो का नही दिया। बस समता के साथ उपसर्गो को सहन करते रहे। सबसे बड़ा कारण है की ज्ञानी पुरुष जानता है कि अपने जीवन में शत्रुओं को बढ़ाना नहीं है क्योंकि कौन सा व्यक्ति कब किस भाव से निर्मित बंद कर कर्मों का उदय पैदा करते किसी को पता नहीं इसीलिए हमें वर्तमान समय में शत्रुओं को बढ़ाना नहीं चाहिए बल्कि अपने कर्मों के उदय को शांत रहकर सहन करना चाहिए। एवं समता पूर्वक उनका सामना करके अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना है गुरुदेव ने भगवान की छवि का वर्णन करते हुए बताया कि भगवान का तेज सूर्य से भी अधिक तेज होता है। भगवान की शीतलता चंद्रमा की शीतलता से भी अधिक शीतल हुआ करती है। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि भगवान की वाणी एक होती है लेकिन पात्र के अनुसार अलग-अलग हो जाया करती है।

संकलंन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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