कल 15 अगस्त है। आजादी के 75 साल का जश्न। आजादी के सही मायने समझने के लिए आज आपको 1947 के बंटवारे से जुड़े ये 3 किस्से जरूर पढ़ने चाहिए। ये किस्से डरावने हैं, लेकिन उससे भी ज्यादा प्रेरणा देने वाले हैं।
उस वक्त पाकिस्तान से भारत का सफर मौत से कम नहीं था। सड़कें खून से लाल थीं। भारत जा रही ट्रेनों में लोगों को नाम पूछ-पूछकर तलवारों से काटा जा रहा था।
लोग गहने-दौलत, जमीन-जायदाद सब पाकिस्तान में छोड़ने को तैयार थे। बस एक ही ख्वाहिश थी- किसी तरह अपने घर, अपने देश पहुंच जाएं, लेकिन उस वक्त कुछ लोग ऐसे भी थे, जो जान जोखिम में डालकर अपने आराध्य, अपने भगवान की दर्जनों प्रतिमा अपने साथ लेकर आए।
भगवान को अपने साथ लाने की जिद ऐसी थी कि पायलट ने मना कर दिया तो लोग प्लेन से उतरने को तैयार हो गए, तो कोई भगवान की लौ लेकर ट्रेन से हिंदुस्तान पहुंचा।
इनमें श्रीजी की दर्जनों प्रतिमाएं जयपुर के आदर्श नगर स्थित श्री मुल्तान महावीर जैन मंदिर में विराजित हैं। वहीं, दुर्गापुरा के श्री झूलेलाल महाराज मंदिर में हैदराबाद (पाकिस्तान) के गिदुबंदर से लाई गई अखंड लौ प्रज्वलित है।

…लेकिन ये सफर आसान नहीं था। भास्कर उन लोगों तक पहुंचा, जो इस डरावने सफर का हिस्सा थे।
मैं पांचवीं में पढ़ता था, 11 साल उम्र रही होगी। पूरे पाकिस्तान में दंगे हो रहे थे। तय हुआ कि हिंदुस्तान जाएंगे। माता-पिता और समाज के लोग जानते थे पाकिस्तान की जमीन पर श्रीजी भगवान का मान बरकरार नहीं रह सकेगा।
तय किया कुछ भी करना पड़े, श्रीजी को मुल्तान (पाकिस्तान) में नहीं छोड़ेंगे। भगवान को भारत लेकर ही जाएंगे।
मंदिर जाकर सैकड़ों साल पुरानी धातु व संगमरमर सहित कई तरह के पत्थरों से तराशी गईं प्रतिमाओं और वर्षों पुरानी पोथियों को लकड़ी की पेटियों में भर लिया गया। समाज के तीन-चार लोगों ने मुम्बई से प्लेन बुक किया।

गलियों में छिपते-छिपाते मुल्तान के एरोड्रम पहुंचे। रास्ते में जो देखा, नहीं भूल सकता। मारकर लोगों को पेड़ों और दीवारों पर लटका दिया था, कुछ तड़प तक रहे थे। हम गलियां बदलते-बदलते एरोड्रम पहुंचे।
उस समय प्लेन छोटे थे। पायलट अंग्रेज था, जो पेटियों को देख अड़ गया। बोला – इतने वजन के साथ प्लेन नहीं उड़ सकेगा। यह सुन लोग प्लेन से उतर गए और कहा- हमारी चिंता मत करो, पेटियों को भारत पहुंचा दो, हम यहीं रह जाएंगे।
ये सुनकर पायलट का दिल पसीज गया। बोला- मैं ट्राई करता हूं। प्लेन दौड़ाया और सफल उड़ान भरी। सभी ताज्जुब कर रहे थे। प्लेन जोधपुर पहुंचा, तो पायलट ने पूछा कि पेटियों में क्या है? तब हमने बताया- इसमें हमारे भगवान हैं। ये सुनकर पायलट ने पेटियों के ही हाथ जोड़े और चला गया।

ऐसा खौफ कि हर दम हाथों में मिर्च पाउडर रखते : प्रकाश देवी
मैं उस वक्त 10 साल की थी, चौथी में पढ़ती थी। हमारा रेशम का कारोबार था। उस वक्त दंगाइयों का ऐसा डर था कि घर में हर समय हाथ में मिर्च पाउडर रखते थे।
मुझे आज भी याद है- मुल्तान का ऐरोड्रम हमारे घर से 6 या 7 किलोमीटर ही दूर था, लेकिन वो यात्रा ऐसे थी जहां हर तरफ जान का खतरा था।
प्लेन में कौन-कौन बैठेगा, इसके लिए रेडियो पर एक दिन पहले देर शाम 20-25 लोगों के नाम लिए जाते थे। हर घर में रेडियो तक नहीं होते थे, तब सभी उसके घर इकट्ठा होते थे, जिसके घर रेडियो होता था। रेडियो में हमने मेरे माता-पिता व मेरा नाम सुना।
पिता ने तांगे का इंतजाम किया और उसमें बैठ कर हम गलियों में से होते हुए एरोड्रम पहुंचे। मुख्य सड़क से जाना मौत को दावत देने जैसा था। सड़कें खून से लाल थीं।
किसी तरह हम एरोड्रम पहुंचे। जब श्रीजी की प्रतिमाओं से भरी पेटियां लोड हो गईं, तब सभी ने प्लेन में बैठना शूरू किया था। पायलट ने अधिक वजन की बात की, तो सभी प्लेन से उतरने को तैयार हो गए थे।

गुल्लक घर-घर रखकर मंदिर के लिए जुटाए रुपए
हम बहुत भाग्यशाली हैं और श्रीजी को यहां लाने वाले लोगों का जितना धन्यवाद करें, उतना कम है। मैं भी पाकिस्तान रहता था। अब भी भूला नहीं हूं, तब 5 साल का था। श्रीजी के लिए मंदिर बनाना था तो समाज के लोगों के घर-घर गुल्लक रखवा दिए थे। जैसे-जैसे पैसा इकट्ठा हुआ, वैसे-वैसे मंदिर बन गया। समाज के बाहर से कोई योगदान नहीं लिया। आज ये भव्य मंदिर सभी की आस्था का प्रतीक है।
सुभाष चंद जैन, मंदिर समिति के अध्यक्ष

दंगाइयों से बचाकर ट्रेन से लाए भगवान की लौ
बाबा जेठगिल और उनकी पत्नी पपूर बाई सिंध के हैदराबाद में रहते थे। दंपती को डर था कि जब वे भारत चले जाएंगे, तो हैदराबाद के गिदुबंदर स्थित झूलेलाल मंदिर की कोई कद्र नहीं करेगा। यहां की अखंड लौ बुझ जाएगी। दोनों ने तय किया ये लौ वे अपने साथ भारत ले जाएंगे।
लौ लेकर किसी तरह बचते-बचाते वे और मोहल्ले के दूसरे लोग रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां भी खौफ का माहौल था। ट्रेन में लोगों को नाम पूछकर मारा-काटा जा रहा था। चलती ट्रेन से लोगों को फेंका जा रहा था।
किसी तरह लोगों ने एक होकर मुकाबला दिया और दंगाइयों को डिब्बे से बाहर धकेला और दरवाजा बंद कर लिया। भगवान का नाम लेते हुए लाहौर से ट्रेन आगे निकली।
भारत पहुंचकर बाबा जेठगिल और उनकी पत्नी पपूर बाई काफी समय दिल्ली और जयपुर के कैंपों में रहे। वहां भी खुद से ज्यादा ध्यान लौ का रखा। किसी तरह जिंदगी पटरी पर आई तो उन्होंने दुर्गापुरा में मंदिर बनाया और लौ वहां प्रतिष्ठित कर दी। आज भी यहां रोज आरती होती है।
