आचार्य श्री धनी गरीब, हानि, लाभ, मिट्टी, सोना, छोटे, बड़े किसीसे भी प्रभावित नहीं होते सुविज्ञ साग़र जी

JAIN SANT NEWS भीलूडा

आचार्य श्री धनी गरीब, हानि, लाभ, मिट्टी, सोना, छोटे, बड़े किसीसे भी प्रभावित नहीं होते सुविज्ञ साग़र जी

भीलुड़ा

शांतिनाथ मंदिर में विराजित जीनियसो के जीनियस आचार्य
कनकनंदी महाराज श्री के शिष्य मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने गुरु का स्वरूप बताते हुए कहा की आचार्य श्री धनी, गरीब,हानि, लाभ, मिट्टी, सोना, छोटे बड़े किसी से भी प्रभावित नहीं होते वे सब में समत्व भाव रखते हैं। वर्तमान में सभी लोग भौतिकता से इतने प्रभावित हैं कि सद्गुरु की पहचान नहीं कर पा रहे हैं। गुरुदेव के पास आने वाला हर व्यक्ति समता, सुख, शांति का अनुभव करता हैं। जिसके लिए स्वर्ग के देवेंद्र भी तरसते हैं। समता ,शांति, एकांत, ध्यान,मौन में रहने वाले अधिक पुरुषार्थी हैं। कनकनंदी गुरुदेव ने आगम, विज्ञान के अनुसार साहित्य सृजन करके, आगम के रहस्यो का उद्घाटन करके विश्व को अलौकिक उपलब्धि दी हैं। उन्होंने 12000 कविताएं लिखी है। लगभग 400 ग्रंथों के लेखक है। उनका साहित्य 100 विश्वविद्यालयों में पीएचडी, M Phil हेतु उपलब्ध हैं। वह दुनिया के दबाव से परे हैं उन्हें कोई प्रभावित नहीं कर सकता हैं। आचार्य श्री द्वारा लिखित कविता दुनिया बोलती है बोलती रहें मैं विद्यार्थी हूं मैं शोधार्थी हूं कविता सुनाई तथा उसका भावार्थ बताया कि सभी को परमात्मा पद प्राप्त करने का समान अवसर जैन धर्म के साम्यवाद में हैं। साधु का विहार भव्य जीवों के कल्याण के लिए होता हैं। गुरु को समझे बिना परमात्मा को नहीं समझ सकते हैं। आचार्य श्री स्वयं को विद्यार्थी, बालक, शोधार्थी मानते हैं, अनुभव भी करते हैं। हमेशा शोध बोध में लगे रहते हैं। आचार्य श्री के प्रश्नों के उत्तर बड़े-बड़े वैज्ञानिक नहीं दे पाते तो भी कहते हैं जब तक तेरहवा गुणस्थान प्राप्त नहीं कर लूंगा,तब तक स्नातक नहीं बन सकता। मैं शांति का पथिक, मोक्ष का पथिक हूं। इससे हमें शिक्षा मिलती हैं कि हमें भी जीवन भर विद्यार्थी ही बने रहना चाहिए। तभी कुछ सीख सकते हैं, ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। परमात्मा के गुणों को प्राप्त करने के लिए हम भगवान का गुणानुराग ,गुण स्मरण, पूजा, आराधना करते हैं जिससे हमारे गुणों में वृद्धि होती हैं। तुम्हारी आत्मा ही तीर्थ स्वरूप है तुम अन्य जगह क्यों भटकते हो। आचार्य श्री का स्वभाव पारदर्शी है। किसी से कोई छुपाना नहीं किसी के सामने कोई प्रदर्शन नहीं। धर्म का संबंध भाव विशुद्धी से है।

आचार्य श्री अपनी कविता में लिखते हैं कि मैं कनकनंदी भी नहीं देशी भी नहीं, विदेशी भी नहीं, किसी पंथ विशेष का नहीं, किसी जाति विशेष का नहीं ,मैं समदर्शी हूं। क्षुद्र सीमा से परे जिस प्रकार आकाश को कोई सीमा बांध नहीं सकती वैसे ही आचार्य श्री को कोई बांध नहीं सकता, आकाश को अग्नि नहीं जला सकती वैसे ही राग द्वेष आचार्य श्री को प्रभावित नहीं कर सकते। समता का अर्थ ज्ञाता दृष्टा आत्म तत्व को जानने वाला, मैं संकीर्ण राष्ट्रवादी नहीं परंतु राष्ट्र प्रेमी हूं। संत किसी को अपना पराया नहीं समझते। संत निर्बंध, निर्द्वन्द होते हैं। तीर्थंकर बुद्ध ऋषि सब अकेले चल कर दुनिया को छोड़कर महान बने हैं। भौतिक संसार छाया है। संतों का धन संतोष होता है। भारतीय सभी धर्म आध्यात्मिक है। छह द्रव्य सात तत्व में मुख्य आत्म तत्व है।

साधु मुख्य रूप से कषायों का त्याग करते हैं। संसार में फंसाने वाले नहीं संसार से तारने वाले गुरु होते हैं। आधुनिक शिक्षा नौकर बनाने की है, नैतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक बनाने की नहीं। पानी के दबाव को पार करने वाला पानी के ऊपर तैरता है वैसे ही दुनिया के दबाव से ऊपर उठने वाले संसार से पार होते हैं। सद्गुरु सद्बुद्धि प्राप्त करना अति दुर्लभ है। साधु परचिंता को छोड़कर स्वचिंता में लगे रहते हैं ।

सुवत्सलमति माताजी ने अपनी स्वरचित कविता सुनाई “संसार एक नदिया है सुख दुख दो किनारे हैं” मुनि श्री विनय गुप्त जी” “कनक ज्ञान मिले सुबह शाम हर क्षण बीते सुख से तन मन को मिले आराम” यह स्वरचित कविता सुनाइ मुंबई से पंडित कीर्ति तथा पंडित पंकज भैया ने अपनी स्वरचित कविता” जब से लिया गुरु नाम बिगड़े बन गए सब काम, जगत हितकारी गुरुवर जगत उपकारी गुरुवर प्रस्तुत की। प्रस्तुतकर्ता
विजयालक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी

संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

Comments (0)

Your email address will not be published. Required fields are marked *