हिंसा से तो सभी बच सकते है, लेकिन निज की हिंसा से बचने का हम सोचते भी नहीं हैं। शुद्धसागर महाराज
रावतभाटा
नयाबाजार सुपार्श्वनाथ जैन मंदिर में वर्षायोग की बेला मे धर्मसभा मे मुनि श्री शुद्धसागर महाराज ने भक्तो को जिनवाणी का रसपान कराते हुए कहा की व्यक्ति सदा यह सोचता है कि मेरी ओर से किसी का घात न हो लेकिन वह कभी नहीं सोच पाता है कि मेरी ओर से मेरा ही घात न हो जाए। इन शब्दों का भाव समझाते हुए मुनि श्री ने कहा मेरी ओर से जो कर्म का बंध हो रहा है,वहीं मेरी ओर से मेरा घात है। वहीं मेरे निज की हिंसा है। पूज्य मुनि श्री ने उद्घोष करते कहा की पर हिंसा से तो सभी बच सकते है, लेकिन निज की हिंसा से बचने का हम सोचते भी नहीं पाते हैं। उन्होंने विस्तृत रूप से कहा कि पर की हिंसा छोड़ने से नरक मार्ग दूर हो जाएगा, तिर्यंच मार्ग भी दूर हो जाएगा, अशुभ गति भी नहीं मिलेगी, लेकिन इससे मोक्ष भी नहीं मिलेगा। उन्होने कहा जब हमारे अंदर स्व हिंसा व पर हिंसा का भाव होगा तब तक हम मोक्ष नहीं जा सकते हैं। उन्होने श्रावको से कहा पर की हिंसा छोड़ना तेरा लक्ष्य है, परन्तु निज की हिंसा छोड़ने का तेरा कोई लक्ष्य नहीं है। संसार में लोगों ने ऐसा सोच रखा है कि धर्म क्षेत्र में जाने से,धार्मिक कार्यक्रम करने से धर्म हो जाता है,लेकिन ऐसा किंचित मात्र भी नहीं है। सही मायने मे धर्म वहीं होता है,जहां हम पर को छोड़कर निज की और जाए। हमें सच्चे देव को ही पूजना है, कुदेव को पूजने पर हमें मिथ्यात्व का बंध होता है।
उन्होने अंत मे कहा यदि हम अपने मन में यह सोच ले कि एक दिन सबको जाना है,अर्थात् संसार का नियम है, जो आया है वह जाएगा, लेकिन यदि हम सही में इस बात को समझ ले तो हमारी परिणीती ही बदल जाएगी। उन्होंने सम्यक दृष्टि जीव के लक्षण बताते हुए कहा कि सम्यक दृष्टि जीव अन्याय को छोड़कर, अनीति को छोड़कर संसार में रहेगा, परन्तु संसार से विरक्त होकर। वह घर में तो रहेगा, लेकिन उसके अंदर घर नहीं रहेगा। वह इस प्रकार रहेगा
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमंडी
