गुरु की शरण में जाने पर ही होता है कल्याण इस अमूल्य मनुष्य जीवन को सांसारिक भोगों में व्यर्थ मत करो: माताजी
ग्वालियर
जब तक हम भगवंत की दिशा में नहीं बढ़ते, पंच गुरु की शरण में नहीं जाते, तब तक हमारा कल्याण नहीं होगा। जब हम अनेकांत के संपर्क में आते हैं, तो एकांत खत्म हो जाता है। कोई भी बिना शिष्य बने गुरु नहीं बन सकता, बिना पुत्र बने पिता नहीं बन सकता। यह उदगार ब्रह्म विद्या वाचस्पति पट्ट गणिनी आर्यिकाश्री विज्ञमती माताजी ने बुधवार को चम्पाबाग बगीची में गणधर वलय स्तोत्र सेमिनार में व्यक्त किए।






माताजी ने कहा कि अनेकांत की दृष्टि रखना है, स्याद्वाद से मंडित अनेकांत स्वीकार करना है तो अपने विभाव को स्वभाव में लाना होगा। हमें संसार से स्वयं की ओर उतारना होगा, साधना से अपने मानव जीवन को सार्थक बनाना होगा! क्योंकि बिना साधना के हम संसार मे ही भटकते रहेंगे! अपने इस अमूल्य जीवन को सांसारिक भोगों में व्यर्थ मत करो! मानव जीवन की महत्ता को समझते हुए आत्म कल्याण की ओर कदम बढाओ!
संसार से मुक्ति के लिए प्रयास करना होगा
माताजी ने बताया कि जब मनुष्य का जन्म होता है, तब सब रिश्ते मिल सकते हैं, लेकिन पत्नी नहीं मिलती। उसे लेने जाना पड़ता है। इसी तरह इस संसार सागर से मुक्ति के लिए प्रयास करना पड़ते हैं। माताजी ने कहा कि इस चातुर्मास में धर्म के साथ आत्मा की प्रभावना भी करना है।
7वें काव्य की व्याख्या की
जैन समाज के प्रवक्ता ललित जैन ने बताया कि बुधवार को आर्यिकाश्री विज्ञमती माताजी ने गणधर वलय स्तोत्र के 7वें काव्य की विस्तार से व्याख्या करते हुए बताया कि इस काव्य की अर्चना करने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं। शक्ति प्राप्तक होती है।
प्रवचन सभा से पूर्व श्री यंत्र के समीप सुरेन्द्र जैन वैक्सीन, ममता जैन एवं प्रज्ञा जैन ने दीप प्रज्वलित किया!
संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया ramganjmandi
