सत्य का दुरुपयोग नही करना चाहिए कनकंनदी गुरुदेव

JAIN SANT NEWS भीलूड़ा

सत्य का दुरुपयोग नही करना चाहिए कनकंनदी गुरुदेव

भीलूड़ा

शांतिनाथ जैन मंदिर के स्वाध्याय भवन में स्वाध्याय तपस्वी वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि सत्य का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। क्रोध, मान, माया, लोभ, परनिंदा, ईर्ष्या, द्वेष, घृणा आदि भाव असत्य हैं। जो असत्य है। परम सत्य के लिए जो साधन है वह अमृत हैं। जहां प्रमाद है वहां हिंसा, चोरी, बलात्कार आदि सभी पाप आ जाते हैं। स्वयं अनंत घमंडी होने पर गुरुदेव को घमंडी मानते हैं। अहिंसा को समझना सरल है, परंतु सत्य को समझना कठिन है। शिष्य के दोष दूर करने के लिए गुरु डाटेंगे नहीं तो वह भी असत्यवादी, हिंसक बन जाएंगे। गुरु को कड़वा वचन बोलकर आत्म संतुष्टि होती है क्योंकि शिष्य में सुधार हो रहा होता हैं। गुरु के विश्वहित के भाव होते हैं। सत्य की शक्ति अनंत होती है। सत्य को नाश करने वाले अभी तक कोई अणु बम नहीं बना है, और भविष्य में भी नहीं बनेगा।निस्पृहसाधु का विरोध करने वाले नरक से आए होंगे या नरक में जाएंगे। मूर्ख दुष्ट दुर्जन की संगति करना, अच्छा मानना नरक जाने के लक्षण है। अधिक क्रोध करने वाला, अशुद्ध भाव के वचन बोलने वाला नरक में जाऐगा। क्रोधी, क्षुद्र विचार वाला, माया चारी करने वाला, संक्लेश करने वाला, वैरत्व रखने वाला, खोटा काम करने वाला, जिसको अंधेरा पसंद हो, बदबू मुंह से व शरीर से आती हो तथा दया परोपकार गुणवान आदि दूसरों के अच्छे गुण जिन्हें अच्छे नहीं लगते हो वह किल्विष जाति के असुर देव बनते हैं या नरक में जाते हैं। कटु वचन साधुओ को बोलने चाहिए। कटु वचन बोलना साधु के लिए अनिवार्य हैं। मल मुत्र को करोडो रुपयों की लैबोरेट्री में करोड़ों गुना बड़ा करके वैज्ञानिक लोग डॉक्टर लोग अनुसंधान करते हैं, तब रोग के बारे में अनुसंधान कर पाते हैं वैसे ही गुरु शिष्य के छोटे से दोष को भी बड़ा करके दिखाते हैं तब शिष्य के दोष रूपी रोग दूर होते हैं।

आचार्य श्री के प्रिय शिष्य आज्ञा सागर जी गुरुदेव में बताया कि आचार्य श्री सत्य के उपासक ही नहीं सत्य स्वरूप हैं तीर्थंकर की वाणी बिना देखे हुए भी सुनकर अधिकतम समझ में आती है वैसे ही आचार्य श्री के आचरण से सत्य झलकता हैं। आचार्य श्री सत्य का विषय प्रतिपादन सर्वांग से करते हैं। जिस किसी ग्रंथ का स्वाध्याय कराते हैं उस ग्रंथ के पुराने आचार्य उमा स्वामी, अकलंक देव शिवकुटी वीरसेन आदि बन कर के विषय को अच्छी तरह से समझाते हैं। उपनिषद, मनुस्मृति, सर्वार्थसिद्धि, राजवार्तिक आदि ग्रंथों को अच्छी तरह से ह्रदयघंम कराते हैं। सत्य के मार्ग पर चलने का ही उपदेश देते हैं। स्वयं सत्य का ही जीवन में आचरण करके स्वयं की आत्मा ही पूर्ण सत्य है इसका प्रतिपादन करते हैं। मुनि श्री सुविज्ञ सागरजी ने

“मेरा मन दर्पण सम होय मेरा भाव दर्पण सम होय”

आचार्य श्री द्वारा रचित कविता से मंगलाचरण किया।
विजय लक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी

संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

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