चिंता से किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकता, बल्कि चिंता स्वयं एक समस्या है। समयसागर महाराज
बन्डा
पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री समयसागर जी महाराज सानिध्य मे सिद्धचक्र महामंडल विधान की इस बेला मे पूज्य मुनि श्री ने मंगलधाम में विशाल धर्मसभा संबोधित करते हुए कहा कि क्रोध व्यक्ति को शराब की तरह विचारशून्य और लकवे की तरह शक्तिहीन कर देता है। अर्थात् क्रोध तन व मन को खोखला कर देता है। क्रोध वह समस्या है जो व्यक्ति को ही नहीं पूरे परिवार और समाज को अशांत बना देता है। क्रोध से चित्त की निर्मलता समाप्त हो जाती है। क्रोध अविचार पूर्वक स्व और पर को दुःख देने वाली एक प्रवृत्ति है। क्रोधित व्यक्ति अग्नि सहित लकड़ी के समान है।
मुनिश्री ने कहा कि साढ़े नौ घंटे के शारीरिक श्रम से जितनी शक्ति क्षीण होती है, 5 मिनिट के क्रोध रूपी विष से उतनी शक्ति क्षीण हो जाती है। हम सरोवर न बन सकें तो कम से कम आग तो न बनें। जैसे आग को बुझाने के लिए पानी की आवश्यकता होती है उसी प्रकार क्रोध रूपी अग्नि को बुझाने के लिए क्षमा रूपी जल आवश्यक होता है। क्षमा एक ऐसी घाटी है जहां केवल शांति के ही फूल लगते हैं और शांति की प्राप्ति होते ही मन पवित्र हो जाता है।
मुनिश्री ने कहा कि चिंता से किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकता, बल्कि चिंता स्वयं एक समस्या है। चिंता पर चिंतन करने से चिंता अपने आप समाप्त हो जाती है। इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति चिंता करके समस्या का समाधान नहीं निकाल पाया। जीवन में जो होता है उसे प्रेम से स्वीकार करो। यही सोचे कि जो होता है वह अच्छे के लिए होता है। चींटी को कणभर और हाथी को मन भर मिलता ही है। जिसे न किसी बात की चिंता है, न किसी बात की चाह और न किसी बात का डर उसका ही मन शांति का अनुभव कर सकता है। मुस्कराहट से जिसको गम का घूंट पीना आ गया। यह हकीकत है जहां में उसको जीना आ गया।
प्रवचन से पहले पूर्व आचार्यश्री विद्यासागर महाराज के चित्र का अनावरण करने का सौभाग्य विपिन बिलानी, प्रमोद पटवारी, मौना ठेकेदार, प्रशांत चौधरी, मुकेश जैन, पंकज डांगीडहर को प्राप्त हुआ। ज्ञानदीप का प्रज्ज्वलन छोटेलाल बमाना, अशोक शाकाहार, गुट्टू भाईजी, पवन पार्षद, अनु जैन, बिट्टू खटोरा, सौरभ जैन एवं संचय जैन ने किया। प्रवचन सभा का संचालन ब्रह्मचारी नीलेश भैया बंडा ने किया।
