युवा दिगम्बर सन्त की नेत्र ज्योति बगैर डॉक्टरी इलाज के केवल प्रभु भक्ति से वापिस आना
ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी पर विशेष
19 वर्षीय नव दीक्षित युवा दिगम्बर साधु की नेत्र ज्योति बगैर डॉक्टरी इलाज के केवल प्रभु भक्ति से वापस आना यह संस्मरण बाल ब्रह्मचारी यशवंत भैया का जो आज वात्सलय वारिधि आचार्य वर्धमान आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के रूप जिन धर्म की ध्वजा पुलकित किये हुए है।

यह संस्मरण है बाल ब्रह्मचारी श्री यशवंत से 108 नव दीक्षित मुनि श्री वर्द्धमान सागर जी का समय सन 1950 से वर्ष 1969 के बीच ज्येष्ठ

ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी का नेत्र ज्योति का धोर उपसर्ग यह प्रसंग बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिसमे आप पढ़कर द्रवित होने से नही रोक पाएगे कि कितना महान उपसर्ग को नव दीक्षित दिगम्बर साधु प्रभु भक्ति और गुरुओ के आशीर्वाद से कैसे दूर होते है। अकल्पनीय धन्य है मुनिवर। धन्य है धन्य है।

मुनि श्री वर्द्धमान सागर जी की नेत्र ज्योति अनायास चले जाना जब श्री महावीर जी अतिशय क्षेत्र से आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज का विहार जयपुर खानिया जी हुआ
ज्येष्ठ शुक्ला 5 पंचमी संवत 2025 सन 1969
को अनायास नव दीक्षित मुनि श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज की नेत्रों की रोशनी चली जाती है। उस समय उम्र मात्र 19 वर्ष थी उनकी उसी समय डॉक्टर बुलाये गए डॉक्टरों ने नेत्रों का परीक्षण किया। और अगले दिन पुनः परीक्षण का परामर्श दिया। अगले दिन डॉक्टरों ने नेत्रों का परीक्षण किया डॉक्टरों ने परामर्श दिया कि बिना इंजेक्शन लगाए नेत्र ज्योति आना नामुमकिन है।
संध में विचार विमर्श होने लगा कि मात्र 19 वर्ष की उम्र में इतना उपसर्ग क्या किया जावे।
दीक्षा छेद कर डॉक्टरी इलाज कराने की भी चर्चा चली,लेकिन वो साधना पर दृढ़ थे।
मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज के कानों में चर्चा पहुँचने पर उन्होंने ने विनय पूर्वक किन्तु दृढ़ता से निवेदन किया की वह इंजेक्शन नही लगवायेंगे।
प्रसंग आने पर समाधि ले लेंगे
मुनि श्री अभिनंदन सागर जी वात्सल्य भाव से प्रभु से कहते है मुनि श्री वर्द्धमान सागर जी की नेत्र ज्योति जब तक वापिस नही आती तब तक मेरा सभी 6 प्रकार के सभी रसों का त्याग रहेगा।
शिक्षा गुरु मुनि श्री श्रुत सागर जी करुणावश कहते है कि इतनी अल्प अवस्था मे कितना दृढ़ता पूर्वक महान त्याग और इतना जबरदस्त उपसर्ग। आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी प्रभु से कहती है कि आप अरिहंत प्रभु बड़े है या यह डॉक्टर
49 घण्टे का समय बीत गया नेत्र ज्योति वापस नही आती है, तब शाम 5 बजे मुनि श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज पहाड़ी पर स्थित ऊपर मंदिर में जाने की भावना बताते है।
तेज धूप के बावजूद मुनि श्री की इच्छा कारण पूरा संघ ऊपर के मंदिर जाता है।
मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने *1008 श्री चंद्र प्रभु की वेदी पर मस्तक रख कर आचार्य पूज्य पाद स्वामी द्वारा रचित श्री शांति भक्ति का पाठ स्तुति प्रारम्भ की।
आचार्य श्री धर्म सागर जी सहित सभी मुनिराज आर्यिका माताजी 47 साधु श्री शांति भक्ति का पाठ करते है।
होना क्या था 3 घण्टे अर्थात नेत्र ज्योति जाने के 52 घण्टे बाद। प्रभु भक्ति से बिना डॉक्टरी इलाज के नेत्र ज्योति वापस आ जाती है।
उस घटना के समय आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज श्री सहित 17 मुनि, 25 आर्यिकाये,4 क्षुल्लक एवम 1 क्षुल्लिका सहित 47 साधु विराजित थे। नेत्र ज्योति आने पर भारत वर्ष सहित जयपुर में हर्ष की लहर फैल गयी। संघ के साधुओ ने 24 घण्टे तक निरंतर श्री शांति भक्ति का पाठ किया सचमुच बगैर चिकित्सा कराए प्रभु भक्ति से नेत्र ज्योति वापस आना वर्तमान युग मे विश्व का एक मात्र उदाहरण है।
विवरण
परमपूज्य आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी जी आकाश गमनी विद्या से आकाश में गमन कर रहे थे, तब सूर्य की प्रचंड तेज रोशनी से आचार्य श्री पूज्य पाद स्वामी जी की नेत्र ज्योति जाने पर श्री पूज्य पाद स्वामी ने श्री शांति भक्ति की रचना कर नेत्र ज्योति वापस पाई थी। उसी पवित्र शांति भक्ति के पाठ से परम पूज्य मुनि श्री वर्द्धमान सागर जी की नेत्र ज्योति वापस आई ,इन देव आशीर्वाद से प्राप्त पवित्र नेत्रों से जब गुरुदेव का वात्सल्य मयी आशीर्वाद मिलता है तो भक्त का मानव जीवन सफल हो जाता है।
साक्षी
1969 की इस घटना की साक्षी वर्तमान में दिगम्बर साधुओ में सर्वाधिक दीक्षावधि की गणनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी
आर्यिका श्री शीतल मति जी आदरणीय श्री रविन्द्र कीर्ति जी सहित अनेक श्रावक श्राविकाएं इस ऐतिहासिक पल की साक्षी है
वर्तमान में पंचम पट्टाधीश सन1969से वर्तमान तक

यही युवा मुनि आगे धर्म मार्ग पर दृढ़ता से निरन्तर आगे बढ़ते हुए प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांति सागर जी की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा में पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी के रूप में चतुर्थ कालीन चर्या का पालन कर रहे है
वर्तमान में मध्यप्रदेश होकर अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी की और विहार चल रहा है
यह संस्मरण लिखते हुए श्री राजेश पंचोलिया कहते है की लिखते हुए मेरी अश्रु की धारा निरंतर बहती रही।
कोटिशः नमोस्तु
राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य वारिधि परिवार से प्राप्त जानकारी
संकलित अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी
