एक व्यसन ही व्यक्ति को स्वतः अनेक व्यसनों का आदी बना लेता है
प्राचीन समय की बात है किसी नगर में एक व्यक्ति थे जो अब तक सभी दुराचारों से दूर थे,किसी भी प्रकार का व्यसन नही था,एक बार वे पैदल ही रास्ते से गुजर रहे थे तभी बीच राह में उन्हें कुछ लोग (महिला-पुरुष)बाजे के साथ झुमते हुए मिले,उन लोगो ने आ रहे उस व्यक्ति को अपने दल में खींच लिया व जबरदस्ती उसको नचाने लगे,वह व्यक्ति भी यही सोचकर कि नाचने में क्या बुराई इसलिए वह भी उनके साथ नाचने लगा तभी उन लोगो मे से कुछ मदिरा लेकर आये व सबको पिलाने लगे जब उस व्यक्ति को भी मदिरा दी तो पहले तो वह ना नुकुर करने लगा,लेकिन जब ज्यादा अनुरोध किया तो वह सोचने लगा भांग का नशा तो अपने त्योहारों में भी करते है तो ये भी नशे के लिए ही है इसलिए थोड़ी ले ली जाए,भाई साहब ने थोड़ी मदिरा घटका ली,जब ले ही ली तो उसके बाद कम क्या,ओर भी घटका ली
नशा चढ़ गया वे भी सबके साथ झूमने लग गए शाम को वही उन सबके सामूहिक भोज जिसमे अभक्ष्य मांसाहार भी था पर नशे में कोई भान नही वो भी घटक गए,नशेड़ी समूहों में रात्रि में जुआ भी खेला ओर व्याभिचार भी कर लिया।

साहब ने एक मदिरा का सेवन किया किन्तु मांस,जुआ,पर स्त्री गमन के भी स्वतः शिकार हो गए और उसके आदी भी।

इसलिए कोई पहले मदिरा से तो कोई व्याभिचार वासना से स्वतः धीरे धीरे सभी व्यसनों का आदि हो जाता है जो अपने कुल,समाज व धर्म का सबसे बड़ा कलंक बन जाता है।
शाह मधोक जैन चितरी
