चौबीस वर्ष बाद अपने जन्म आवास पर हुए आर्यिका अनर्घमति माताजी के आहार

JAIN SANT NEWS अशोक नगर

चौबीस वर्ष बाद अपने जन्म आवास पर हुए आर्यिका अनर्घमति माताजी के आहार

अशोक नगर

गुरुवार की मंगल बेला में चौबीस वर्ष उपरांत आर्यिका श्री अनर्घमति माताजी का आगमन अपने जन्म आवास पर हुआ। वह स्थान पावन भूमि जहां इनका जन्म हुआ। उस आवास पर आहार चर्या हुई। इन पलो को पाकर परिवार जनों की खुशी का ठिकाना ना रहा।

ज्ञात रहे जैन साधु संत किसी के घर नहीं जातें, चाहें फिर वे अपने परिवार जन ही क्यों ना हो। सिर्फ एक ही अवसर होता है जब वह किसी श्रावक के घर जाते है पडगाहन की विधि मिलने पर। आर्यिका अनर्घमति माताजी का पडगाहन परिवार जनों ने किया वह आहारचर्या सम्पन्न हुई।मध्यप्रदेश महासभा संयोजक माताजी के ग्रहस्थ जीवन के भाई विजय धुर्रा ने बताया कि विधि पूर्वक आहार ग्रहण करने के बाद माताजी ने अपनी गृहस्थ अवस्था की मां को संबोधन करते हुए परिवार से मोह कम रखने को कहा। इस दौरान सभी को आहार देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सचमुच वह स्थान तो वैसे ही पुलकित पावन हो जाता है जहाँ सन्त जन्म लेते है। यह वह स्थान जहां कभी इन्होने अठखेलिया की, पली बढ़ी,औऱ धार्मिक क्रियाओं में उन्नत होकर मुक्ति के पद पथ पर आरूढ़ हो गई। तेरा सो तेरा मेरा भी तेरा की प्रवृत्ति को जीवन में लाना है–आदर्शमति माताजी संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की परम शिष्या आर्यिका रत्न श्री आदर्श मति माता जी ने प्रवचन सभा मे उद्बोधन में कहा कि दुनिया में तीन प्रकार के लोग होते हैं पहले जो अपनी सम्पत्ति के साथ दुसरो की सम्पदा को भी हड़प लेना चाहते,इसके लिए उन्हें चाहे दंगल ही क्यों ना करना पड़े। ये मेरा सो मेरा तेरा भी मेरा वाले लोग होते हैं। दुसरे वे लोग जो अपनी सम्पत्ति में ही सन्तुष्ट रहकर कार्य करते रहते हैं। वे मेरा सो मेरा तेरा सो तेरा वाले श्रावक कहलाते हैं। इस दुनिया में तीसरे तरह के संत प्रव्रति के लोग होते हैं जिन्हें तेरा सो तेरा मेरा भी तेरा के स्वभाव को धारण कर सन्तुष्ट होकर, आगे बढ़ कर निरन्तर जगत की भलाई में लगे रहते हैं। ये सज्जन पुरुष इस धरती के संत साधु कहलाते हैं।
हम संत नहींन सकते तो दंगल वाले ना बने
उन्होंने कहा कि हम संत नहीं बन सकते तो दंगल वाले कभी ना बने।

कम से कम श्रावक मेरा तो मेरा है, तेरा तेरा है।ऐसे सरल परिणामी बनकर संत जनों का सत्संग कर अपने जीवन को सफल बनाएं।
ऊंचाइयों को पाने के बाद अच्छा सोचें दुर्लभ मति माता जी धर्म सभा में आर्यिकाश्री दुर्लभ मति माता जी ने कहा कि आज हम जगत से ऊपर उठ गये सिद्धों की आराधना रूप श्री सर्वाथसिद्धि ग्रंथ राज का मंगलाचरण करने जा रहे हैं। जो हम सब का मंगल करने वाला है। ऐसे महान ग्रंथ की रचना सैकड़ों वर्षों पहले आचार्य श्री पूजपाद स्वामी ने जंगलों में बैठकर ताड़ पत्रों पर की थी।
उन्होंने कहा कि अनंत ऊंचाइयों पर रहने वाले सिद्धों की तरह बहुत ऊंचाइयों पर उड़ने वाला गिद्ध पक्षी भी नीचे पड़े मरे हुए जानवरों को ही ढूंढता रहता है। ऐसी ही स्थिति इस मनुष्य की है, जो दुर्लभ मानव पर्याय को पाकर भोगों को ढूंढता रहता है। वहीं मन्दिरों में रहने वाले सिद्ध प्रभु तीनलोक के अग्रभाग सिद्धशिला पर विराजमान हैं। हमें इनके अनुसार करके सिद्धत्व को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करते रहना चाहिए

संकलन अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

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