भक्ति शबरी और केवट की तरह होना चाहिए संभवसागर महाराज

JAIN SANT NEWS खुरई

भक्ति शबरी और केवट की तरह होना चाहिए संभवसागर महाराज

खुरई

प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर मे धर्म सभा मे भक्ति और समर्पण पर जोर दिया उन्होने कहा भक्ति सबरी एवं केवट की तरह होना चाहिए। जिसमें केवल समर्पण ही समर्पण दिखता है त्याग, तपस्चर्या इतना होने के बाद भी मन में आकुलता के भाव नहीं, बस एक ही विश्वास की डोर जो भगवान राम को भी कुटिया तक लाने में बाध्य कर देती हैं। श्रद्धा, भक्ति एवं समर्पण ऐसा ही होता है। जिस सेवा के पहले या बाद में तनिक भी सांसारिक इच्छा की हलचल न हो, वह निष्काम सेवा है। इसके अतिरिक्त सब सेवाएं सकाम सेवा होती है। जो सेवा की जाती है, वह सकाम सेवा है। जो सेवा होती है, वह निष्काम सेवा है। उन्हाेंने कहा कि निष्काम सेवा, पूर्णतया शान्त मन व्यक्ति के द्वारा ही होती है। बड़े-बड़े महात्माओं व संतों, तीर्थंकरों ने दुनिया की सेवा की नहीं, उनके द्वारा दुनिया की सेवा हुई है। वे कर्तृभाव और अहंभाव से मुक्त थे। करने की वासना से उनका संबंध टूट चुका था। चपल मन लाैकिक कामना सहित होता है। संभव है, किसी में कामना की मात्रा बहुत कम हो। फिर भी उसमें कर्तृत्वभाव और अहंभाव होता ही है। वह अपने को सेवा करने वाला मानता है। सेवा उसकी रूचि का विषय है। भले ही जनता से अन्य किसी फल की आकांक्षा नहीं रखता, फिर भी सेवा करने से उसे संतुष्टि और खुशी का अनुभव होता है। संतुष्टि खुशी स्वयं में सेवा का मधुर फल है और उसका वह उपभोक्ता है। इसलिए उसकी जन सेवा, सकाम सेवा है। उन्हाेंने कहा कि शांत मन कामना रहित होता है। वह निरपेक्ष कर्तृत्वभाव और अहंभाव से मुक्त होता है। वह अपने को सेवा करने वाला नहीं मानता। सेवा उसकी रूचि या अरूचि का विषय भी नहीं होता। सेवा के बाद संतुष्टि खुशी या अन्य किसी प्रकार की लौकिक इच्छा की हलचल का अनुभव नहीं करता। ऐसे व्यक्ति की जनसेवा, निष्काम होती है। वस्तुतः ऐसा व्यक्ति जनसेवा करता नहीं, उससे जनसेवा होती है। सेवा करने और होने में बहुत अंतर है

संकलित अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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