● प्राकृत जैनागम मूलग्रन्थ स्वाध्याय●

● प्राकृत जैनागम मूलग्रन्थ स्वाध्याय●

● प्राकृत जैनागम मूलग्रन्थ स्वाध्याय●

Day 30 : : तत्त्वसार गाथा 58 – 59
ग्रंथकार- आचार्य देवसेन स्वामी
प्रस्तुति- डॉ. पुलक गोयल, जबलपुर

उभय-विणट्ठे भावे
णिय-उवलद्धे सु-सुद्ध-ससरूवे।
विलसइ परमाणंदो
जोईणं जोय-सत्तीए।।58।।

किं किज्जइ जोएणं
जस्स य ण हु अत्थि एरिसी सत्ती।
फुरइ ण परमाणंदो
सच्चेयण-संभवो सुहदो।।59।।

Video के द्वारा अर्थ समझने के लिए click करें
➡️

तत्त्वसार | आचार्य देवसेन स्वामी | द्रव्यानुयोग | गाथा 01-74 | शुद्ध पाठ | शब्दार्थ | व्याकरणिक विश्लेषण | व्याख्या | डॉ. पुलक गोयल : https://www.youtube.com/playlist?list=PLb6OtA3xYjEMlxRECwcg1rrSXHjC5L_lg

★Share in all ur Jain groups★

Comments (0)

Your email address will not be published. Required fields are marked *