विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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एक दिन उनके अंतस में स्थापित ज्ञान ने सम्यक चरित्र का आह्वान किया तो वे ५१ वर्ष की उम्र में गृह त्याग कर चल पड़े दीक्षा पथ पर संवत् २००४ में ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया और ८ वर्ष ब्रह्मचारी अवस्था में व्यतीत किये। फिर सम्वत् २०१२ में क्षुल्लक दीक्षा ली और ४ वर्ष बाद सम्वत् २०१६ मे तत्कालीन आचार्यवर शिवसागर जी मुनि महाराज से जयपुर, उपनगर खानिया (राजस्थान) में मुनि दीक्षा ग्रहण कर मुनि-पथ के पंथी बने। मुनि हो अपने देहात्म को तपस्या में प्रवृत्त किया और संसारवासियों के लिए धर्मपंथ प्रशस्त किया।

“लगभग १० वर्ष बाद, नगर नसीराबाद के प्रबुद्ध समाज ने एक राय होकर उन्हें आचार्यपद पर आरुढ़ करना चाहा, उस समय तक उनके संघस्थ शिष्यों में प्रमुख पू० मुनि विद्यासागरजी उनके अविभाज्य अंग के रूप में ख्यात हो चुके थे। अतः समाज ने पू० विद्यासागरजी के सान्निध्य में, ७ फरवरी १९६९ (तदनुसार फाल्गुन कृष्ण पंचमी, शुक्रवार, वि.सं. २०२५) को पू० मुनि ज्ञानसागरजी को आचार्यपद पर विराजने की प्रार्थना की, जो उन्हें न चाहते हुए भी स्वीकार करना पड़ी। वे उस दिवस हो गये प.पू. आचार्य १०८ श्री ज्ञानसागरजी महाराज”।

एक जून सन् १९७३ दिन शुक्रवार को समाधिमरण पूर्वक नगर नसीराबाद में उन्होंने श्रेष्ठ साहस का परिचय देकर मृत्यु को अपना कर्तव्य करने का अवसर प्रदान किया शान्तचित्त से और हो गए मृत्युञ्जय।

श्रमण परम्परा में विशेष स्थान बनाने वाले उन महान् मुनि का हम स्मरण करते हैं तथा उनके परम मेधावी शिष्य आचार्यवर विद्यासागर मुनि महाराज को अपने मध्य उपस्थित पाकर कृतकृत्य होते हैं। हमें वर्तमान में ‘ज्ञान’ और ‘विद्या’ एक साथ सुलभ हैं. यह हमारे किसी अदीठ पुण्य का सुफल है।

आज के भारत में, मुनियों के मध्य, दिवाकर की तरह सदा ज्ञान और ध्यान से प्रकाशित आचार्य विद्यासागरजी महाराज को गुरुवर ज्ञानसागरजी महाराज हमें दे गए हैं, जो उनकी ही तरह ज्ञान-पुञ्ज के धारक तपस्वी हैं। हम में से जिनने पू० ज्ञानसागरजी का वियोग सहा है, उन्होंने तुरन्त ही पू० विद्यासागरजी का संयोग पाने का सौभाग्य भी पाया है। सच भी है गुरु ज्ञान का लहराता सागर था तो शिष्य ‘विद्या का गंभीर सागर’ है। इस महान् उपलब्धि का श्रेय पू० ज्ञानसागरजी को ही जाता है।

(गुरुवर ज्ञानसागरजी के चरित्र वर्णन में एक पूरा ग्रन्थ भर सकता है, यहाँ तो हम उनके प्रिय शिष्य विद्यासागरजी का जीवन दर्शन पढ़ रहे हैं। अतः पुनः हम मूल कथा पर आते हैं। जिन पाठकों को पू० ज्ञानसागरजी की जीवनी पढ़ना हो, वे इस लेखक द्वारा लिखित ‘ज्ञान का सागर पढ़े। )

पोस्ट-111…शेषआगे…!!!

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