
पर्वराज पयूषण के अंतिम दिन दोपहर के समय श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर धाम पन्ना में भगवान वासुपूज्य स्वामी का मोक्ष कल्याण बड़ी धूमधाम से मनाया गया। माता जी के मुखारबिंदु से उच्चारित मंत्रों द्वारा श्रीजी का अभिषेक पूजन आदि भी किया गया व अंत में माताजी ने सभी धर्मावलंबी बंधु जिन्होंने पिछले 10 दिनों में जो भी निर्जला उपवास , एकाशन , उनोदर आदि व्रत रखखर पूजन या जिस भी प्रकार से तपस्या की है सभी को आर्शीवाद प्रदान किया । माता श्री ने उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म के विषय में बताते हुए कहा कि ब्रह्म का अर्थ होता है आत्मा ।
आत्मा की उपलब्धि के लिये किया जान वाला आचरण ब्रह्मचर्य कहलाता है । अर्थात जो अपनी आत्मा के जितने नजदीक है वह उतना बड़ा ब्रह्मचारी है और जो आत्मा से जितना दूर है वह उतना ही बड़ा भ्रमचारी है । बह्मचर्य एक बहुत उच्च आध्यात्मिक साधना है और बह्मचर्य का संबंध केवल यौन सदाचार या यौन संयम तक ही सीमिति नहीं है अपितु बह्मचर्य तो विशुद्ध आध्यात्मिक दृष्टि से संपन्न होकर जीना है । काम वासनाओं का मन से वचन से तथा शरीर से परित्याग करके अपनी आत्मा में रमना ब्रह्मचर्य है । संसार में समस्त वासनाओं में सबसे तीव्र कामवासना है । अन्य इन्द्रियों का दमन करना तो बहुत सरल है किन्तु कामवासना की साधनभूत काम इन्द्रियों को वश में करना बहुत कठिन है । हमें बह्मचर्य का पालन करने के लिये एक उम्र के साथ अपने आप को रोकना होगा , बार बार टोकना होगा , अपने आप को थामना होगा । देखा गया है कि मनुष्य का तन भले ही काम न कर रहा हो पर उसके मन में इच्छाएं सतत जाग्रत होती रहती हैं , जिससे उसका विनाश लगभग तय ही है । जब हम इन इच्छाओं से मुक्त होंगे तब ही उत्तम ब्रह्मचर्य का पालन होगा और हमारा जीवन धन्य होगा । आगे माताजी ने सभी को विजय सेठ और सेठानी की कथा सुनाते हुए बताया कि शील वत्र को धारण करने वाला 100 त्यागियों से भी श्रेष्ठ माना गया है । वहीं रात्रिकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बड़ों की आरती प्रतियोगिता गाजे -बाजे के साथ संपन्न हुई।
