

जैन धर्म धर्मावलंबियों द्वारा 10 लक्षण धर्मों के महापर्व प y षण को श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया जा रहा है । पर्युषण पर्व का तीसरा दिन उत्तम आर्जव धर्म के रूप में मनाया गया । श्री 1008 चिंतामणी पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन बडा मंदिर धाम , पन्ना में 105 क्षु . आराधनाश्री माता जी व क्षु . श्री 105 साधनाश्री माता जी के ससंघ सानिध्य में बड़ी धूमधाम से मनाया गया । माताजी ने अपनी देशना में श्रावकों संबोधन देते हुए कहा आर्जव अर्थात आत्मा का स्वाभाव ही सरल स्वभाव है । इसलिये सदैव परिणाम सरल रखो। छल – कपट मत करो । छल – कपट करने वाला प्राणी एक न एक दिन पकड़ा ही जाता । बाहर से आप कितने ही अच्छे बने रहो यदि अंदर छल – कपट है तो यह माया है । माया छोड़नी होगी , अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन केवल दस वर्ष तक ही साथ रहता है परन्तु ग्यारहवां वर्ष लगते ही वह समूल नष्ट हो जाता है । मायाचारी का धन बिजली के समान क्षणिक है । सदाचारी की कमाई से उसकी तुलना किसी अंश में भी नहीं हो सकती । मन – वचन – काया की वक्रता का न होना यह उत्तम आर्जव धर्म है । व्यक्ति को लगता है मेरी माया को कोई देख नहीं रहा , परन्तु उसकी माया को वह स्वयं देख रहा है या नहीं और व्यक्ति अगर यह माया करना छोड़ दे तो काया अवश्य ही पलटेगी । माया करने वाला तिर्यंच गति को प्राप्त होता है । जीव वही रहता है पर्याय बदलती है । पर्युषण पर्व के अवसर पर रात्रि के आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में भक्तामर स्त्रोत की प्रतियोगिता रखी गई , जिसमें 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों ने भाग लिया । इस प्रतियोगिता में उन्हे गोला बनाकर लाइन से भक्तामर के एक एक श्लोक का उच्चारण करना था जो बालक अंत तक सही श्लोक पढ़ते जा रहे थे वो विजयी हुए । इस प्रतियोगिता में आगम जैन , अनेकान्त जैन , सुमित जैन , गुनगुन जैन , सम्यक जैन , श्रुति जैन , आन्या जैन , नेहा जैन विजयी रहे ।
