#विद्याधर_से_विद्यासागर (किताब)![]()
दीक्षोपरांत मुनि विद्यासागरजी अध्ययन की दिशा में और अधिक श्रमशील हो पड़े। पूज्य गुरु ज्ञानसागरजी का सान्निध्य उन्हें पल-पल पढ़ाता लगता। देखते ही देखते उन्होंने न्याय शास्त्र जानने प्रमेयरत्नमाला, प्रमेयकमलमार्तण्ड, अष्टशती एवं अष्टसहस्त्री पूर्ण किया और सभी महान् तथा क्लिष्ट ग्रन्थ उतार डाले हृदय के आइने पर गुरुवर उन तीक्ष्ण बुद्धि वाले शिष्य से सदा प्रसन्न रहते थे। पूर्ण संतुष्टि के बाद गुरु ज्ञानसागरजी ने समयसार पढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। फिर प्रवचनसार और फिर पंचास्तिकाय । कुन्द कुन्द के तीनों रत्नों का परिचय करा दिया गुरु ने शिष्य को शिष्य हो गए तीन स्नों के पारखी नियमसार, अष्टपाहुड, मूलाचार भी उनके अध्ययन क्षेत्र में शीघ्र आ गए और अल्प समय में ही समा गए उनके मानस में।कुछ ही समय में विद्यासागर नाम के मुनि लोगों द्वारा विद्या के सागर’ मनोनीत कर दिए गए। कहते भी यही ‘गुरु ज्ञान का सागर है तो शिष्य विद्या का सागर क्यों न हो।’गुरुवर ज्ञानसागरजी को अष्टसहली जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ पढ़ाते हुए जिसने देखा है, वह कह सकता है ज्ञानसागरजी सही में ज्ञान के सागर थे। अष्टसहस्री न्याय का महा अरण्य है, जिसमें विद्वान् गण घनघोर जंगल की झुरमुट में चलने में पारंगत वनराज की तरह होते हुए भी भटक जाते हैं, परन्तु ज्ञानसागरजी ८० वर्ष की उम्र में भी उसके श्लोकों-सूक्तियों को मौखिक समझाते थे। वे विद्यासागरजी से उसके अर्थ/ भावार्थ / अन्वयार्थ सुना करते थे और उचित मार्गदर्शन दिया करते थे। देश के मूर्धन्य विद्वान् हंसी-हंसी में अष्टसहस्त्री को क्लिष्टसहस्त्री कहते थे, तब ज्ञानसागरजी उसे मिष्ठसहस्री कहकर पढ़ाते थे।पोस्ट-107…शेषआगे…!!!
