#शेयर
#विद्याधर_से_विद्यासागर (किताब)
#चलते_फिरते_सपना_आया:
विद्यासागरजी की दीक्षा वाला मंदिर बस गया मल्लप्पा परिवार की आँखों में श्री जी कहती है यह बड़ा घड़ा की नसियां हैं, दीक्षा इधर दी गई होगी। वे हाथ से संकेत करती रहती हैं। उन्हें बड़े पुत्र महावीर की बातें याद हो आती हैं जो उन्होंने अजमेर से लौट जाने के बाद घर पर सुनाई थीं। उन्हें दीक्षा वाले स्थान पर अपना विद्या दिखने लगता है ब्रह्मचारी भेष में क्षणभर को वह सब दिखने लगा है, जो महावीरप्रसाद ने बतलाया था, हाँ यही कि ब्रह्मचारी विद्याधर को मुनि दीक्षा दी जा रही है, चारों ओर सहस्रों दर्शक खड़े हैं। विद्याधर दीक्षा के कार्यक्रम में पाँच दिन से व्यस्त रहे हैं, लगातार श्नायुक दाब बढ़ता कमता रहता है, एक थकान उभर आई है. उनके चेहरे पर गर्मी का प्रभाव अलग बना है सारे माहौल पर ऊपर से एक उपवास दीक्षा से एक दिन पूर्व का उपवास आहार लेने के बाद उन्हें मस्तिष्क में गर्मी चढ़ गई है, वे पसीने में डूबे हुए लौटे हैं नसियां में उनकी ताप चढ़ी-छवि किसी से छिपती नहीं है। श्रावक जन रीठे के पानी से उनके पैरों के तलुओं का मर्दन कर रहे हैं।श्री जी को विद्यासागर के तलुओं के मर्दन के दृश्य से राहत मिलती है आराम का आभास उनके चेहरे पर प्रगट हो पड़ता है। वे आगे सोचने लगती हैं- रीठा से तो बहुमूल्य सोना चाँदी की वस्तुएँ साफ की जाती हैं, आज ये चरण धोए जा रहे हैं, ये भी तो बहुमूल्य हो चुके हैं।उन्हें क्षणभर को एक विचित्र अनुभूति होती है सोने की नसियां में सोने की मूर्ति देखती हुई वे एक और नई बात देखने लगती हैं अपने दिवास्वप्न में सोने के मंदिर में ‘सोने जैसी छवि’ के दर्शन उनके नेत्र ठीक ही कर रहे थे, वे तो बचपन से ही स्वर्ण वाली आभा के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। स्वर्ण मंदिर में स्वर्ण-मूर्ति हो और स्वर्णिम मुनि भी हो तो?स्वर्ण स्वर्ण स्वर्ण सभी की आँखों में स्वर्ण का सात्विक सौन्दर्यसमा गया। स्वर्णाभा लिए लौट आए सब डेरा पर।पोस्ट-104…शेषआगे…!!!
