● प्राकृत जैनागम मूलग्रन्थ स्वाध्याय●

।।स्वाध्याय परमं तपः।। ● प्राकृत जैनागम मूलग्रन्थ स्वाध्याय●

● प्राकृत जैनागम मूलग्रन्थ स्वाध्याय●

Day 23 : : तत्त्वसार गाथा 44 – 45
ग्रंथकार- आचार्य देवसेन स्वामी
प्रस्तुति- डॉ. पुलक गोयल, जबलपुर

जो अप्पाणं झायदि
संवेयण-चेयणाइ-उवजुत्तो।
सो हवइ वीयराओ
णिम्मल-रयणत्तओ साहू।।44।।

दंसण-णाण-चरित्तं
जोई तस्सेह णिच्छयं भणइ।
जो झायइ अप्पाणं
सचेयणं सुद्ध-भावट्ठं।।45।।

Video के द्वारा अर्थ समझने के लिए click करें
➡️

तत्त्वसार | आचार्य देवसेन स्वामी | द्रव्यानुयोग | गाथा 01-74 | शुद्ध पाठ | शब्दार्थ | व्याकरणिक विश्लेषण | व्याख्या | डॉ. पुलक गोयल : https://www.youtube.com/playlist?list=PLb6OtA3xYjEMlxRECwcg1rrSXHjC5L_lg

★Share in all ur Jain groups★

Comments (0)

Your email address will not be published. Required fields are marked *