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सुकुमारललनकोमुनिन_बनाओ:
श्रावकों श्रेष्ठियों के घर पर चर्चा जोर पड़ने लगी कि विद्याधर को मुनि दीक्षा दी जाने वाली है गुरुवर श्री ज्ञानसागरजी द्वारा
श्रावकजन किलप उठे। नई उम्र में मुनि दीक्षा? उन्हें दुख हो आया।
विद्याधर की कच्ची उम्र मुनि चर्या की वज्रता कैसे सहेगी? कुछ ऐसे भी सीमित ज्ञान वाले थे जो उल्टा बतला बैठते- अभी विद्याधर बहुत कम उम्र के हैं, कहें कच्चे युवा हैं। उन्हें मुनिपद दिया गया और कहीं कल को कुछ ठीक-ठाक निर्वाह न कर सके तो देश के सारे समाज को नीचा देखना पड़ेगा। आदि आदि।
धीरे-धीरे नगर में तीन दल हो गये। पहला दल उनका था जो कड़े गले से कहने के लिए तैयार थे कि विद्याधर को इतनी नई उम्र में मुनि दीक्षा न दी जावे। यह था समृद्ध सेठों-साहूकारों का दल।
दूसरा दल उनका था जो उनकी कच्ची उम्र और मुनिचर्या के संभावित कष्टों को देखकर मन ही मन दुखी था।
तीसरा दल सबसे बड़ा था और आम श्रावकों का था, जो यह विश्वास करता था कि गुरुवर ज्ञानसागर जो करेंगे, सोच समझकर करेंगे, उन्हें धर्म, समाज और देश का बोध है।
जो होगा, उचित होगा। तीनों दल अपनी अपनी प्रतिक्रियाएँ मंदिरों, शास्त्र सभाओं और हाट दुकानों में प्रकट करते रहते धीरे-धीरे वह दिन समीप आ गया जिसे मुनि दीक्षा के संदर्भ में इतिहास का सुनहरा पृष्ठ मिलने वाला था।
प्रथम दल के सम्पन्न घराने वाले लोगों को पता चल गया कि विद्याधर को ३० जून, १९६८ को गुरुवर ज्ञानसागरजी जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान करेंगे। ३० जून का दिन दूर नहीं था। दो दिन ही शेष रह गये थे। प्रथम दल के दस-पाँच गणमान्य श्रेष्ठि सर सेठ भागचंद सोनी के साथ पहुँचे गुरुवर ज्ञानसागरजी के पास ‘नमोऽस्तु’ के बाद सभी गम्भीर बन गए और महाराज श्री की ओर शंकालु दृष्टि से देखने लगे।
महाराजश्री चुप रहे आए। तब मौन तोड़ा भागचंद जी ने हाथ जोड़कर बोले- गुरुवर आप स्वतः प्रकाण्ड विद्वान् हैं, महातपसी हैं, अतः आप ही बतलाइए कि साढ़े इक्कीस वर्ष का युवक मुनि पद की कठिन चर्या का निर्वाह कैसे कर सकेगा? आपका यह कदम अभी न उठे, चार वर्ष बाद उठे तो अच्छा रहेगा। तब तक के लिए आप चाहे तो ब्रह्मचारी जी को क्षुल्लक और ऐलक अवस्थाओं की प्रतीति करा सकते हैं। शीघ्रता क्यों?
पोस्ट-86…शेषआगे…!!!
