विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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सेठ की बातों से विद्याधर मुस्का पड़े। बोले, रुको, अभी बतलाता हूँ।

पहुँच गये गुरु चरणों के समीप। साथ में ले गये सेठ को बतलाया उसका मन्तव्य गुरुवर सब कुछ भाँप चुके थे। बोले- हां मैंने सेठ को बोला था कि पुरानी धोती फट जाने पर नवीन धारण करनी चाहिए।

मगर…… मगर….. बोल न पा रहे थे विद्याधर गुरुवर के समक्ष । साहस करके एक वाक्य ही बोले- मगर महाराज श्री अभी पुरानी धोती फटी ही कहाँ है? और लौट आये निज स्थान पर पीछे सेठ जी भी आ गये। विद्याधर जब पाल्थी मारकर बैठ गये, तब बोले सेठ जी उनसे ब्रह्मचारी जी, अब तो गुरुजी ने भी कह दिया, कृपया नवीन धोती, ग्रहण कीजिए।

संकोच में पड़ गये विद्याधर । उनका अपरिग्रहवाद सेठ जी के कारण खतरे में पड़ रहा था। वे सेठ जी की भक्ति-भावना को पहचान रहे थे, पर असमर्थ थे, अतः जी कड़ककर बोले- अभी तो ले जाइये यह धोती, समय आने पर बतलाऊँगा।

शांत हो गये सेठ । नवीन धोती सहित वापस आ गये निवास पर
परन्तु सेठ मात्र सेठ नहीं थे, वे थे एक धर्मज्ञ श्रावक, एक विद्वान् नागरिक उन्हें विश्वास हो गया कि ज्ञानसागर का यह शिष्य भविष्य में तपस्वियों का सम्राट् होगा। वे मंद-मंद मुस्काते रहे। उन्हें अपने प्यारे तपस्वी का निर्णय अच्छा लगा। उनकी श्रद्धा द्विगुणित हो गयी।

वे भारत की स्वस्थ मुनि परम्परा की श्रेष्ठता पर विचार करने लगे। यह युवा तपसी कल कोई अति श्रेष्ठ परम्परा को जन्म देगा यह महावीर के अपरिग्रह को आमूलचूल समझ रहा है, यह अपरिग्रह के क्षेत्र में भी कोई मौलिक सुधार प्रदान करेगा, भविष्य में नई सीमाएँ बनायेगा। नये क्षितिज गढ़ेगा। नई ऊँचाइयों को स्पर्श करेगा। धन्य है वह युवा योगी !

पोस्ट-79…शेषआगे…!!!

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