विद्याधर से विद्यासागर

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यहवैद्यहैयाजादूगर-

सेवा और संकल्प की गंगा बह पड़ी अजमेर की उस नसियाँ के
प्रांगण से। देखने-समझने वाले बतलाते कि गुरुभक्ति की ऐसी मिसाल कहीं अन्य देखने नहीं मिली। मगर विद्या को तो मिसाल बनने / बनाने से कोई प्रयोजन न था।

वे तो अपने पथ पर थे। बस उस पथ पर रहकर यह सब करना होता है, यह वे अच्छी तरह जानते थे ।

ज्ञानसागरजी के गले में दर्द हुआ। विद्याधर जाने कैसे जान गये। बस, स्निग्ध उंगलियाँ सहलाने लगीं उनका गला, गले का वह बिन्दु जिस पर दर्द ने आक्रमण किया था।

उनके सहलाने से जाने क्या जादू होता कि कुछ ही क्षणों में ज्ञानसागरजी का दर्द विदा ले जाता। वे कभी विद्या को देखते, कभी उनकी गोरी गोरी स्वच्छ अंगुलियों को बुदबुदाते इसके हाथ में जादू है।

पोस्ट-75…शेषआगे…!!!

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