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प्रथमश्रेणीका_यात्री : यायावर की तरह युवक दक्षिण से उत्तर की ओर देश की लंबाई लाँघता- फलाँगता पहुँच गया बाम्बे-सेन्ट्रल जहाँ से ट्रेन बदलकर अजमेर जाना है। अजमेर वाली गाड़ी अभी आई नहीं है। प्रतीक्षा करनी होगी। सामने एक कक्ष के समक्ष बोर्ड पर लिखा है –
“प्रथम श्रेणी यात्रियों के लिए प्रतीक्षालय।”
विद्याधर उठकर सीधे उसमें जा बैठे, वही मराठी का अखबार रखा था टेबल पर उठाकर पढ़ने लगे तब तक प्रतीक्षालय का कर्मचारी आ गया। भूखे-प्यासे विद्या के चेहरे पर उस क्षण दैन्य झलक रहा था ।
कर्मचारी पूछ बैठा, टिकट? विद्याधर ने पाकेट से टिकट निकाल कर बतला दी।
-यह तो थर्ड क्लास की है।
-तो?
- तो क्या तुम फर्स्ट क्लास के प्रतीक्षालय में क्यों बैठे हो ?
- फिर कहाँ बैठता ? वहाँ तृतीय श्रेणी यात्रियों के प्रतीक्षालय में यह कहकर कर्मचारी ने आँखें कुछ अधिक गड़ा दी विद्या के सुकुमार निर्दोष चेहरे पर विद्या उठकर चले गये तृतीय श्रेणी की ओर। वे तो चले गये सहज, परन्तु क्षण भर को प्रकृति सहम गई। कर्मचारी की आँखें काश प्रथम श्रेणी के वास्तविक यात्री को पहचान सकतीं।
खास टिकट खरीदकर प्रथम श्रेणी वाले यात्री तो वह देखता रहा है, पर इस यात्री को, जो प्रथम श्रेणियों के यात्रियों के मध्य में भी सर्वप्रथम, सर्वमान्य हैं, उसे उस कर्मचारी की आदिव्य आँखें न पहचान सकी और उसके देखते ही देखते प्रथम श्रेणी का यात्री तृतीय श्रेणी के कक्ष में चला गया।
धन्य हो गया वह कक्ष, जिसे अनजाने ही उस दिन विद्याधर, होनहार मुनि, के चरण स्पर्श करने का गौरव मिला। ‘प्रथम’ को ठुकरा कर ‘तृतीय’ का गौरव बढ़ाने वाले विद्याधर इस कक्ष के लिए नये नहीं थे, कभी महात्मा गाँधी भी इसी परम्परा में उस कक्ष को अपना स्पर्श दे गये थे। ऐतिहासिक हो गया था वह कक्ष वह प्लेटफार्म वह स्टेशन…!!!
पोस्ट-66…शेषआगे…!!!
