विद्याधर से विद्यासागर

*☀विद्यागुरू समाचार☀* विद्याधर से विद्यासागर

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सदलगा और समीपी परिवेश के लोग चाहे जब आ धमकते विद्याधर के पास लोगों को तो अच्छा लगता अपने विद्या का नैकट्य प्राप्त कर, परन्तु विद्या अचकचा जाते। संकोच होता कि ये मोह के मारे लोग मेरे दैनिक कार्यक्रम में किंचित् विघ्न अवश्य डाल जाते हैं।

गुरु सेवा के क्षण, आगम चिन्तन के पल, या तपाराधन के पहर-स्पर्श कर जाते हैं अपने मोह से ये मोही। यह तो ठीक नहीं। विद्याधर के हृदय में विचार जागा कि काश गुरुवर देशभूषण महाराज यहाँ से प्रस्थान कर देते तो अच्छा रहता। ऐसा ही कहाँ भी था उन्होंने आचार्य श्री को |

जब उन्हें संकेत मिल गये कि आचार्य श्री अभी कुछ अधिक समय देना चाहते हैं दक्षिण भारत को, तो सोच में पड़ गये। वे फिलहाल दक्षिण भारत से, दूर चल देना चाहते थे अतः ऊहापोह में पड़ गये। क्या करें? दक्षिण छोड़ते हैं तो आचार्यश्री भी छूटते हैं रो पड़ा विद्याधर का हृदय कैसे छोडूंगा आचार्यश्री के चरण! जिनके संकल्प दृढ़ होते हैं वे कुछ भी छोड़ने में घबराते नहीं हैं और विद्याधर तो थे त्याग की जीती जागती मूर्ति, निर्मोह की शिला ।

समय विशेष के लिए दक्षिण छोड़ देना उनकी दृष्टि में उचित था। था उनका निश्चय । अतः एक दिन गुरुवर से आज्ञा ली और अपना संपूर्ण वैभव छोड़कर उत्तर भारत को चल देने उद्यत हो पड़े, उनका संपूर्ण वैभव था क्या? ‘गुरु चरणों की रज’ ही उनका वैभव था, वे उसे भी त्याग कर सच्चे निर्मोही बन गये और चल दिये उत्तर की ओर स्वीकार किया तो केवल गुरुवर का मौन आशीष।

पोस्ट-65…शेषआगे…!!!

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