😍”जैसा नजरिया और भाव होते है, वैसे ही चीजे हम सबको दिखती है”।😍
प्रवचनांश- मुनिश्री #प्रमाणसागर🤗 जी महाराज।
युद्ध पूरा होने के बाद अयोध्या में साधुवाद समारोह चल रहा था। युद्ध में योगदान देने वाले सभी बड़े-बड़े महारथियों का अभिनंदन हो रहा था। सभी योद्धा अपनी-अपनी अनुभूतियाँ सुना रहे थे। जब हनुमान जी की बारी आयी, उन्होंने भी अपने शौर्य और पराक्रम की गाथा सुनाई।
जब अशोक वाटिका का प्रसंग आया, तो उन्होंने अशोक वाटिका का वर्णन करते हुए कहा कि ऐसी अद्भुत वाटिका, मैंने धरती पर कहीं नहीं देखी। उस वाटिका की एक विशेषता थी कि उसमें जितने फूल थे, सभी लाल थे। जब हनुमान जी ने कहा कि सारे फूल लाल थे, तो सीताजी ने टोकते हुए कहा – हनुमान! मुझे तो वहाँ एक भी फूल लाल नहीं दिखा। सभी फूल सफेद थे। हनुमान जी ने कहा- “माता! मैं मिथ्या नहीं कहता सारे फूल लाल थे।” मामला उलझ गया। हनुमान जी इस बात पर डटे रहे कि फूल लाल और सीता जी इस बात पर दृढ़ थीं कि फूल सफेद।
रामचंद्र जी को हस्तक्षेप करना पड़ा और कहा “आप दोनों सही हो।” सभी अचम्भे में रह गए, हनुमान जी बोले, “प्रभु! या तो लाल होंगे या सफेद, दोनों सही कैसे?” रामचंद्र जी बोले – “हनुमान बात ऐसी है कि सीता के मन में बड़ी सात्विकता भरी थी, उनकी आँखों में सात्विकता भरी थी इसलिए उन्हें फूल सफेद दिख रहे थे और तुम बड़े गुस्से में थे, तुम्हारी आँखे गुस्से में लाल थी इसलिए सफेद फूल भी तुम्हें लाल दिखाई पड़ रहे थे।”
तात्पर्य यह है कि जैसे हमारी भावनाएं होंगी, वैसा ही हमें आँखों से दिखेगा।
दूसरों के दोष मत देखो, गुण देखो और अपने आपको अच्छाइयों से भरो। दोष देखना है तो अपने देखो।
