*☀विद्यागुरू समाचार☀*

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नमोस्तु_गुरूजी…ज्ञान का महत्व तभी है, जब वह दूसरों की भलाई के काम में आए*। संख्या में एक की अपेक्षा में नौ का अंक बड़ा है उसमें जीरो मिला दो तो दस हो जाता है, पर एक के बिना शून्य की गिनती नहीं है और हम आगे सैकड़ा और दशक की संख्या शून्य बढ़ा-बढ़ाकर कर करते रहते हैं पर ध्यान रखो, आत्मा तो एक ही है। शून्य के पीछे अंक होता है तभी उसका महत्व है शून्य अकेले का कोई महत्व नहीं है। शून्य ज्ञान के समान है और अंक के समान सम्यक दर्शन है। *धर्म पर सच्ची श्रद्धा होना जरूरी है, ज्ञान का महत्व तभी होता है*। मन में जो उजाला दिखता है वह इन्द्रियों के विराम लेने के बाद दिखता है, सारे लोग सांसारिक उलझनों के गुणा-भाग में लगे रहते हैं। बस यहीं गड़बड़ी हो जाती है। वे भूल जाते हैं कि *हमारी आत्मा का सुख सांसारिक उपलब्धियों में नहीं है*।

हमेशा चिंतन को स्वच्छ और साफ रखो उलझे हुए न रहो।
जिस व्यक्ति में साधर्मी भाईयों के प्रति करुणा वात्सल्य नहीं वह मात्र सम्यक दृष्टि होने का दंभ भर सकता है। *जो व्यक्ति जितना सरल व सहज होगा, उसका चिंतन भी सकारात्मक होगा, उसके जीवन में कठिनाइयां भी कम आएंगी।
आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज

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