मानवता के साधक- आचार्य विशुद्ध सागर महाराज

JAIN SANT NEWS

भारतीय वसुन्धरा पर अनादि सनातन श्रमण संस्कृति, जैन धर्म में दिगम्बर आचार्य, उपाध्याय एवं वीतरागी दिगम्बरी यथाजात, पग-विहारी, करपात्री मुनियों का स्तुत्य है. क्षमाशीलता, अहिंसा-प्रियता, शाकाहार, निष्पृहता, सत्याचरण, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रहता आत्मोकर्ष ही इनका लक्ष्य है. जैन साधकों की कठिन चर्या और क्रियाएँ जन-सामान्य के लिए प्रेरणा पुंज हैं. ऐसे ही साधक हैं, आध्यात्म के पुरोधा, योगी दिगम्बर जैनाचार्य 108 विशुद्ध सागर महाराज, आज से 35 साल पहले 21 नवम्बर 1991 के दिन इन्होंने अपने गुरू श्री विराग सागर महाराज से दीक्षा प्राप्त कर मात्र 17 साल की उम्र से ही गृह त्याग कर वीतराग के कठिन मार्ग पर चल पड़े. तब से अब तक 13 राज्यों में एक लाख 25 हजार किलोमीटर से ज्यादा पग विहार कर चुके हैं.
ऐसे महान साधक, जिनकी धर्म प्रभावना से प्रभावित होकर 60 से ज्यादा गृहस्थ मुनि दीक्षा लेकर संयम मार्ग को प्रशस्त कर रहे हैं. इनसे दीक्षित मुनियों की अधिकतर लौकिक शिक्षा यथा इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटेंटस और अन्य विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त हैं. कुछ मुनियों ने लाखों रूपयों का पैकेज छोड़‌कर आत्म साधना मार्ग को चुना है. आचार्य की प्रेरणा से सैकतै युवा, ब्रम्हचर्य व्रतादि ग्रहण कर अपना जीवन सार्थक कर रहे हैं.

दीक्षा समाधिस्थ विराग प्रदाता आचार्य सागर- मध्यप्रदेश के चम्बल संभाग के भिण्ड जिले के रूर गाँव में 19 दिसम्बर 1971 को सभ्रान्त परिवार के राजनारायण के यहाँ योग्य संतान का जन्म हुआ. नाम रखा राजेन्द्र पर इन्हें नेह से लला नाम से पुकारा जाता था. लला ने बाल्यकाल में मात्र 10 वर्ष की वाल्य अवस्था में जैनत्व के मूल नियमों का पालन करना शुरू कर दिया था. मुनि विराग सागर महाराज के भिण्ड प्रवास में उनकी देशना से प्रभावित होकर 11 अक्टूबर 1989 को भिण्ड में छुल्लक दीक्षा अंगीकार की. इसके बाद 19 जून 1991 को ऐलक दीक्षा और 5 महीने ही बीत पाए थे कि आचार्य श्री विराग सागर महाराज से ही पन्ना जिले के जैनतीर्थ श्रेयांसगिरि में 21 नवम्बर 1991 को दिगम्बर मुनि की दीक्षा ले ली. अब नाम रखा गया विशुद्ध सागर, गुरू विराग सागर महाराज ने इनकी लगन और धर्म प्रभावना को देखते हुए आपको औरांगाबाद (महाराष्ट्र) में 31 मार्च 2007 महावीर जयंती के पावन दिन आचार्य पद से विभूषित किया.

175 पंचकल्याणक का बना कीर्तिमान- पंच कल्याणक महोत्सव कराने के मामले में विशुद्ध सागर महाराज ने कीर्तिमान स्थापित किया है. अब तक 175 पंच कल्याणक निर्विघ्न सम्पन्न हो चुके हैं. इस साल वर्ष 2025 में 20 पंच कल्याणक में भगवान को सूरी-मंत्र देने वाले इकलौते महान साधक विशुद्ध सागर हुए हैं. आपका नाम यू.एस.ए. बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड दर्ज है.
सर्वाधिक साहित्य सृजन साहित्य तत्व-ज्ञान को प्रदान करता है. साहित्य से तत्व विद्या सुरक्षित रहा करती है. साहित्य हमारी धरोहर है. साहित्य से हमारे संस्कार सुरक्षित होते हैं. आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी, हिन्दी के साथ-साथ प्राकृत, संस्कृत, मराठी, कन्नड़, अंग्रेजी गुजराती आदि भाषाओं में पारंगत हैं. उन्होंने विपुल मात्रा में साहित्य सृजित किया है. लौकिक शिक्षा भले ही इनकी दसवीं कक्षा तक ही हुई है पर इतनी अल्प शिक्षा के बाद भी नीतिशास्त्र का अलौकिक ग्रन्थ सत्यार्थ बोध सृजित कर विश्व कीर्तिमान बनाया है. इस ग्रन्थ के सूजन पर ब्रिटिश नेशनल यूनिवर्सिटी क्वीन मेरी यूनाइटेड किंगडम और यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका द्वारा आपको डी. लिट उपाधि से सम्मानित किया गया है. वस्तुतः सत्यार्थ बोध आध्यात्म योगी विशुद्ध सागर के अंतरंग मन के चित्त के चिंतन, मंथन, चैतन्य के तत्व ज्ञान से उदभूत मौलिक कृक्ति है. यह पाश्चात्य संस्कृति से अंशात पथ भ्रमित मानव को स्वात्म संस्कृति के प्रति चैतन्य कर सुप्त मानवीय आदर्शों को जाग्रत करता है.

उत्कृष्ट प्रवचनकार आचार्य श्री – हिन्दी के साथ प्राकृत, संस्कृत और अप्रभंश का गहरे स्तर का ज्ञान रखने वाले उत्कृष्ट चिंतक, सर्जक के साथ ही सम्प्रेषणीय प्रवचनकार हैं. प्रतिदिन संघस्थ साधुओं की तीन कक्षाएँ बिना नागा लेते हैं. जैन साधकों में यह आचार्य इकलौते हैं जिनका किसी भी स्थान पर विश्राम हो, वह धर्मप्रेमियों को प्रवचन की परम्परा सतत रूप से कायम किए हुए हैं.
आचर्य का विषय है कि इतने व्यस्त रहकर और लगातार पग विहार करने के वाबजूद ग्रन्थों का सृजन कैसे कर लेते हैं? सर्वाधिक समय मौन साधना आपने जीवन पर्यन्त वस्त्र त्याग कर निर्ग्रन्थ अवस्था स्वीकार की है.
जीवन पर्यन्त वाहन से विचरण न करने का नियम है. जीवन पर्यन्त नमक, तेल, दही एवं मीठा आदि सेवन का त्याग है. रात्रि में पूर्ण मौन रहते हैं. अष्टमी, चतुर्दशी, अष्टानिका और पर्युषण पर्व में मौन साधना करते हैं.

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