✨ जीवदया का अद्भुत सुफल! ✨ सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ की प्रेरणादायक कथा
क्या आप जानते हैं कि एक छोटे से कबूतर की रक्षा ने राजा मेघरथ को तीर्थंकर पद तक पहुँचाया? 🙏
सोलहवें तीर्थंकर भगवान श्री शांतिनाथ का जीवन लोक-कल्याण और दया का अद्भुत प्रतीक है। उनके जीवन की नींव एक पूर्व भव में रखी गई, जब वे राजा मेघरथ थे—पराक्रमी, धर्मनिष्ठ और दया के सागर!
🕊️ शरणागत की रक्षा का संकल्प:
एक दिन व्रत-उपवास के दौरान, भय से कांपता एक कबूतर राजा मेघरथ की गोद में आ गिरा। पीछे-पीछे आए एक बाज ने उस कबूतर की माँग की।
राजा मेघरथ ने स्पष्ट कहा: “शरणागत की रक्षा मेरा धर्म है, मैं इसे नहीं लौटा सकता।”
बाज ने तर्क दिया: “अगर आप धर्मात्मा हैं, तो दोनों की रक्षा करें। मेरे बिना मैं जीवित नहीं रह सकता।”
🔪 राजा का महान त्याग:

इस पर मेघरथ ने घोषणा की: “मैं इस कबूतर के भार के बराबर अपना ताज़ा माँस तुम्हें देता हूँ, तुम इसे खाकर कबूतर को छोड़ दो।”
तराज़ू आया। एक पलड़े में कबूतर रखा गया, और दूसरे में राजा ने अपने शरीर से माँस काटकर रखना शुरू किया। आश्चर्य! कबूतर का पलड़ा टस से मस नहीं हुआ!
💖 प्रेम की पराकाष्ठा:
अंत में, राजा मेघरथ स्वयं उस माँस वाले पलड़े में सहर्ष बैठ गए।
राजा के इस अपूर्व त्याग और दया को देखकर बाज बना देव अपने असली रूप में प्रकट हुआ। उसने राजा की श्रद्धा और दया को अनुकरणीय बताया और क्षमा माँगी।
🌟 तीर्थंकर नामकर्म का उपार्जन:
- राजा मेघरथ ने इसी प्राणीदया के कारण उत्कृष्ट पुण्य का संचय किया।
- आगे चलकर उन्होंने पुत्र को राज सौंप कर दीक्षा ली, कठोर तप और संयम से कर्मनिर्जरा की, और तीर्थंकर नामकर्म का उपार्जन किया।
🤰 शांति के अग्रदूत का आगमन:
- यही जीव सर्वार्थसिद्ध विमान से च्यव कर भाद्रपद कृष्णा सप्तमी को महारानी अचिरा के गर्भ में आया।
- उनके गर्भ में आने से पहले हस्तिनापुर में भयंकर महामारी फैली हुई थी।
- लेकिन गर्भ धारण करते ही महामारी शांत होने लगी और स्थिति सामान्य हो गई।
इसीलिए माता-पिता ने उनका नाम “शांतिनाथ” रखा।
📢 निष्कर्ष:
जीवदया का सुप्रभाव जन्म-जन्मान्तर तक, और देश-देशान्तर तक होता है! एक छोटे से जीव पर की गई करुणा हमें तीर्थंकर पद की ओर ले जा सकती है।
हमारा संकल्प क्या है? हमें भी हर जीव के प्रति दया और प्रेम का भाव रखना चाहिए।
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