श्री शांतिनाथ परमात्मा का 10वा भव – श्री मेघरथ राजा

JAIN SANT NEWS
   जंबूद्वीप के पूर्व महाविदेह में पुंडरीकिणी नगरी में धनरथ राजा थे। उनकी प्रियमति नामक पत्नी थी। उनके यहाँ मेघरथकुमार का जन्म हुआ। समयानुसार पिता ने मेघरथ को राज सौंपा। मेघरथ भली-भांति जैन धर्मका पालन करते थे। पौषधशाला में पौषधग्रहण करके एक दिन वे भगवंत भाषित धर्म का व्याख्यान कर रहे थे। उस समय मरमोन्मुख भय से कंपित दीन दृष्टि घूमाता हुआ एक कबूतर उनकी गोद में आ गिरा और मनुष्य भाषा में अभय की रक्षा मांगने लगा। करुणासागर राजा ने 'डरना नहीं, डरना मत' कहकर आश्वासन दिया। कुछ ही क्षणों में, 'हे राजन् ! वह मेरा भक्ष्य है, मुझे शीघ्र सौंप दे' कहता हुआ एक बाज पक्षी वहाँ आ पहुँचा। राजा ने कहा 'तूझे यह कबूतर नहीं दूंगा, क्योंकि यह मेरी शरण में आया है और शरणार्थी को बचाना क्षत्रियधर्म है। ऐसे प्राणी को मार खाना तुझ जैसे बुद्धिमान को शोभा नहीं देता, तेरे शरीर पर से एक पंख उखाडने से तूझे कैसी पीड़ा होगी? वैसी ही पीड़ा अन्य को भी होगी। तूं यह सोचता नहीं है कि किसी को मार डालने से कितनी पीडा होगी? और ऐसी जीव हिंसा करके तेरा पेट तो भर जायेगा लेकिन नरकगामी पाप तूं कर रहा है, जरा सोच तो सही।' तब बाज पक्षी ने कहा, 'आप कबूतर का रक्षण कर रहे हो, मेरा विचार क्यों नहीं करते? मैं भूख से पीड़ित हूँ, मेरे प्राण निकल जायेंगे। मांस ही मेरी खुराक है। मुझे ताजा मांस आप दोगे?' राजा अपने देह का गोश्त देने के लिये तैयार हो गया। कबूतर के वजन जितना मांस देने के लिये तराजू मंगवाया, एक पलड़े में कबूतर को बिठाकर दूसरी ओर अपने शरीर से मांस काटकर रखने लगा।

   मांस कटता गया लेकिन कबूतर के वजन से कम ही वजन रहा, अंत में राजा खुद तुला में बैठ गया। यह देखकर पूरे परिवार में हाहाकार मच गया। सामंत, अमात्य, मित्रों ने राजा को कहा 'अरे प्रभु! हमारे दुर्भाग्य से आप क्या कर रहे हो? इस देह से आपको पूरी पृथ्वी का रक्षण करना चाहिये। एक पक्षी के रक्षण हेतु शरीर का त्याग क्यों कर रहे हो? यह तो कोई मायावी पक्षी लगता है। पक्षी इतना भारी हो ऐसा संभव है ही नहीं।' परिवार और नगरजन वगैरह ऐसा कह रहे थे तब मुकुट, कुण्डल और माला धारण करे कोई देवता तेज पुंज जैसे प्रकट होते हुए बोले, 'हे नृपपति! आप वाकई मेरू पर्वत जैसे हैं, स्वस्थान से चलित हुए ही नहीं। इशानेंद्र ने अपनी सभा नें आपकी प्रशंसा की वह मुझसे सहन न हो सकने के कारण आपकी परीक्षा करने आये थे। हमारा यह अपराध क्षमा करे।' इस प्रकार कहकर राजा को पूर्वरूप देकर देवता स्वर्ग में पधारे।

   तत्पश्चात मेघरथ राजाने संयम ग्रहण किया और बीसस्थानक का तप विधिपूर्वक करके तीर्थंकर गौत्र प्राप्त कर एक लाख पूर्व आयुष्य भोगकर बारहवें भव में अचिराजी की कोक्ष से अवतार धारण कर श्री शांतिनाथ नामक सोलहवें तीर्थंकर बने।

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