बच्चों को टेंशन से बचाएं, सेवा करना सिखाएं : नम्रसागर महाराज

JAIN SANT NEWS पृथ्वीपुर

नगर के दिगम्बर जैन मंदिर परिसर में सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव में हो रहे विभिन्न कार्यक्रम

पृथ्वीपुर बच्चों को हमेशा तीन चीजें चाहिए शिक्षा, संस्कार, संगति उन्हें दूसरी टेंशन से बचाकर सेवा सिखाएं और सेवा भाव से वह तीनों चीजें ग्रहण करे। उक्त उद्‌गार नगर के दिगम्बर जैन मंदिर परिसर में आयोजित सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव में ऐलक श्री 105 नम्रसागर महाराज ने व्यक्त किए।

महाराज ने कहा बच्चों को तीन चीजें चाहिए पहला अच्छी शिक्षा, दूसरा अच्छे संस्कार, तीसरा अच्छी संगति अथवा सच्ची वीरता। स्कूल में शिक्षा मिलती है तो घर में संस्कार, शिक्षा और संस्कार दोनों मिलकर जीवन का निर्माण करते हैं। कहते हैं एक अच्छी मां सौ स्कूल के बराबर होती है और एक अच्छी संगत हजार किताब बराबर। बच्चों को जनरल नॉलेज के साथ जीवन दर्शन का बोध कराइए। नम्रसागर महाराज ने कहा बच्चों को शिक्षा का उद्देश्य समझाए की इससे केवल सरकारी नौकरी ही नहीं, सही जीवन जीने की कला भी है। धन कमाना और समाज सेवा, इन दोनों का समन्वय ही जीवन को शिक्षित करने का उद्देश्य होना चाहिए। आचार्य विद्यासागर महाराज के शिष्य ऐलक 105 नम्रसागर महाराज की ने श्री सिद्धचक्र महोत्सव में शिक्षा से पहले संस्कार विषय पर संबोधित किया। ऐलक श्री के मंगल सान्निध्य में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का आयोजन चल रहा है। शनिवार को 512 अर्घ्य के माध्यम से सिद्धों की आराधना सम्पन्न हुई।

डिब्बाबंद टेस्टी आइटम और मोबाइल से दूरी बनाने पर जोर

नम्रसागर महाराज ने कहा कि बच्चों को टेन्शन, ट्यूशन, टीवी, मोबाइल गेम, जंक फूड से बचाना चाहिए। बच्चों को घर के भोजन पाने की आदत डालिए, उन्हें समझाइए कि बाजारों के रेडीमेड डिब्बाबंद टेस्टी आइटम स्वास्थ्य के लिए कितने घातक हैं। शाम को भोजन और सुबह के नाश्ता में 12 घंटे का अंतर होना चाहिए। भोजन सोने से तीन घंटे पहले होना चाहिए। मोबाइल बच्चों के लिए नशीला पदार्थ का काम कर रहा है। मोबाइल की खराब लत, बच्चों में कई बुराइयां पैदा कर रही हैं। बच्चों में मोटापा बढ़ रहा है, आंख का फोकस खराब है रहा है। बच्चे जिद्दी और चिड़चिड़े हो रहे हैं, यह सब मोबाइल का ही इन्फेक्शन है। अतः बच्चों को मोबाइल से बचाइए। महाराज ने कहा कि बच्चों का समय सामान नहीं। बच्चों को कहानी सुनाइए, उनके पास बैठिए, स्कूल के कोर्स की किताबों में ही बच्चों को मत चिपका रहने दो, जिंदगी का कोर्स किताबों में नहीं कहानियों में मिलता है। बुजुर्गों की सेवा, उनकी बातों में मिलता है। बच्चों को यह संस्कारों का कोर्स भी कराएं। बच्चों को समझाएं कि नंबर ही जिंदगी नहीं है, मार्कशीट मंजिल नहीं है। यदि परीक्षा में नंबर कम आते हैं तो गलत कदम उठाने की जरूरत नहीं है। संघर्ष कभी बुरा नहीं होता, हार में जीत का विज्ञान छुपा होता है। प्रवचन के दौरान महिला-पुरुष के अलावा बच्चे उपस्थित थे।

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