मधुबन के पर्वतों पर ऐसा झलक रहा है,वात्सल्य व स्नेह का सागर उमड़ रहा है -साधर्मी साधकों के आपसी विनय,सम्मान व वैयवृत्ति की अनूठी मिसाल*
सम्मेदशिखरजी
शाश्वत तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर जी जो जैन दर्शन का सबसे पवित्र व सर्वोच्च पूज्य क्षेत्र है। जहां प्रति वर्ष लाखो जैन धर्मावलंबी व सैकडो जैन संत वंदनार्थ पधारते है।
वर्तमान काल क्रम के 20 तीर्थंकर व अन्नतान्नत महामुनियो की निर्वाण भूमि सम्मेद शिखर जी के श्री स्वर्ण भद्र कूट पर *गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर जी गुरूराज के शिष्य रूपी पवित्र बगिया के श्रेष्ठ तपस्वी सुमन साधना महोदधि पुज्यवर अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी गुरुदेव* 557 दिनों तक जारी रहने वाली सिहनिष्कृडित महाव्रत की कोठोर साधना अखंड मौन व्रत के साथ साध रहे है।
यहअत्यंत कठोर साधना है जिसे इस युग के ज्ञात इतिहास में चार या पांच संतो ने ही पूर्ण किया है।
लेकिन *अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी गुरुदेव* जो की लगभग 3400 फिट की ऊंचाई पर स्थित घनघोर जंगलों के मध्य शिखर जी के श्री पार्श्वनाथ स्वामी की निर्वाण गुफा में प्रवास करते हुए आत्म ध्यान पूर्वक इस व्रत को पूर्ण कर रहे है।
उपवासो की क्रम श्रंखला में जब उनका पारणा होना होता है तब शिखर जी में स्थित समस्त साधु भगवंत गुरुवाद,संतवाद मतवाद से हटकर पद विहार करते हुए श्री स्वर्ण भद्र कूट पर आकर सेवा – वैयावृत्ति पूर्वक इस पारणे को निर्विघ्न कुशलता से संपन्न कराते है।
*वरिष्ठ मुनि श्री पुण्य सागर जी गुरुदेव* नियमित रूप से प्रत्येक पारणे में सम्मिलित होकर अंतर्मना स्वामी का हाथ पकड़कर पडगाहन से लेकर पारणे की चर्या संपन्न करवाते है।
*इसी 21 अक्टूबर के पारणे के दिन “आचार्य श्री प्रमुख सागर जी गुरुदेव” संघ सहित शिखर जी की 55 किमी वाली पैदल परिक्रमा 24 घंटो में पूर्ण करते हुए सीधे पद विहार पूर्वक स्वर्ण भद्र कूट पर आकर इस पारणे में पधारे।
* जो निश्चित ही अपने गुरु भ्राता के प्रति असीम स्नेह,लगाव,विनय व वात्सल्य के भाव से ही संभव है।
ज्येष्ठ संत स्थिवराचार्य श्री संभव सागर जी ऋषिराज के संघस्थ साधु ,मुनि श्री गुणनंदी जी,मुनि श्री जयकीर्ति जी,मुनि श्री महिमा सागर जी,मुनि श्री पियूष सागर जी व अन्य अनेक साधु भगवंत जब पार्श्वनाथ स्वामी के निर्वाण टोक पर आकर इस पारणे को कुशलता पूर्वक पूर्ण कराकर चरण मंदिर के पृष्ठ भाग में आचार्य भक्ति में एक साथ सम्मिलित होते है तो साधु भगवंतो के आपसी विनय का ये पवित्र नजारा जन जन को मंत्र मुग्ध व गौरवान्वित कर देता है।
निश्चित रूप से स्वर्ग के देवेंद्रो को भी लालायित करने वाले शिखर जी के इस महान पुण्यदाई दृश्य को प्रत्येक श्रावक द्वारा अपनी चक्षुओं से प्रत्यक्ष रूप से अवश्य देखना चाहिए।
