यह संसार पक्षियों के मेलो की भाति है संभवसाग़र जी
खुरई
प्राचीन जैन मंदिर में प्रवचन सभा मे अपने उद्बोधन में निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसाग़र जी महाराज ने कहा की यह संसार तो पक्षियों के मेले की भांति है। शाम को वृक्ष पर पक्षियों के झुंड आकर इकट्ठे होते हैं। परंतु सुबहसूर्योदय होते ही सभी पक्षी अलग- अलग दिशा में चले जाते हैं। वर्तमानजीवन में किसी स्वजन के वियोगपर शोक संताप करना अज्ञान ही है।इस प्रकार शोक करने से तो मोहनीयकर्म का ही बंध होता है। महाराज ने कही।
उन्होंने कहा कि जिस मकान को तुमअपना मानते हो अर्थात तुम अपनेको उस मकान का स्वामी मानते होउसे कोई हड़पने की कोशिश करे,कब्जा करे और ऐसी नौबत आजाए कि जिंदा रहने के लिए मकानछोड़ना पड़े तो दिल में कितनी पीड़ाऔर वेदना होगी?
उस पीड़ा का एकमात्र कारण है उस घर के साथ जोड़ा गया स्वामित्व का संबंध, उसके प्रतिममत्व भाव, उसके प्रति आसक्ति पर हां, किराए का घर छोड़ते समय कुछ भी दुख नहीं होता क्योंकि हम जानते हैं कि यह घर हमारा नहीं है।बस, यह हमारा शरीर भी किराए काही घर है। उन्होंने कहा कि आयुरूपीजितना किराया चुकाया है उतने होदिन तक इस घर में रह सकते हैंअधिक नहीं। परंतु अफसोस, इसकिराए के देह-गृह को हमने अपनाघर मान लिया है और इसी कारण इस देह का त्याग करते समय, इस देह के प्रति ममता के कारण हमें अत्यंत पीड़ा का अनुभव होता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
