जैन धर्म की प्राचीनता का प्रमाण देता है गोपाचल पर्वत ग्वालियर

JAIN SANT NEWS ग्वालियर

जैन धर्म की प्राचीनता का प्रमाण देता है गोपाचल पर्वत ग्वालियर

ग्वालियर
श्री रविन्द्र जैन का वो भजन करे करे हम तीर्थ वंदना अवसर बड़ा महान है जहाँ जीव को मिले शान्ति जो वही तीर्थ स्थान है
यह गीत सचमुच सत्यता को दर्शाता है और वदंना करके अलग ही ऊर्जा और परम शान्ति का अनुभव होता है।

यह मेने स्वयंम ने महसूस किया जब गोपाचल पर्वत तीर्थ की वन्दना की वहां का कुशल प्रबधन देखा

वहां के महामंत्री श्री अजित वरेया ने जानकारी हेतु एक पुस्तक भी प्रदान की और समिति की और से अभिनदन भी किया जो अभिभूत करता है। जब पर्वत पर पहुँचकर देखा तो वहां अत्यधिक जिन भगवन्तों की प्राचीन प्रतिमाएं विद्दमान है। जो जैन धर्म की काफी प्राचीन होने की प्रामाणिकता को सिद्ध करता है।

इनका निर्माण उल्लेख मिलता है की तोमरवंसी राजा वीरमदेव, डूंगरसिंह व कीर्ति सिंह के काल में इनका निर्माण हुआ था। जो कही शतकों पुराना है। इस पर्वत की छटा से पूरे ग्वालियर का अवलोकन हो जाता है। जो सुरम्यता को लिए हुए है।पर्वत की श्रृंखला पर एक पत्थर की बावड़ी का एक ऐतिहासिक महत्व है। एक अनूठा जैन तीर्थ है। जो आस्था का केंद्र बिंदु है।

जब इस क्षेत्र के विषय मे हम जब पढ़ते है,विशेष अध्ययन करते है तो ज्ञात होता है की 22 वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ के शासन में जैन श्रावकों ने गोपाचल पर्वत पर भगवान पार्श्वनाथ, केवली भगवान और 24 तीर्थंकरो की 9 इंच से लेकर 57 फुट तक की प्रतिमाएं बनवायी गयी थी। जो आज भी संरक्षित है। तीर्थंकर भगवन्तों प्रतिमाएं दृष्टिगत होती हैं।

इतनी जबरदस्त उकेरी जिन प्रतिमाए है जिन्हें देख हर कोई देख दांतो तले उंगलियां दबा लेता है।

खड़गासन व पद्मासन जिन प्रतिमाए है।

जब 1528 में मुस्लिम शासक बाबर यहां आया तो उसने बर्बरता के साथ इन्हें खंडित करने का आदेश दिया। लेकिन यह प्रतिमाएं तो अतिशय युक्त है। अपना अतिशय दिखलाया प्रतिमा खंडित करते समय उसके सैनिकों की नेत्रों की रोशनी चली गई।

जब बाबर को यह बात पता चली तो उसने खुद वहाँ आकर इन प्रतिमाओं को निर्ममता से तोड़ने का दुस्साहसी प्रयत्न किया,कहा जाता है उसके सैनिकों की की ही तरह उसकी भी नेत्रों की रोशनी चली गई।

तब उसे सबब मिला की और कठोर प्रण लिया की वो आगे किसी भी जिन प्रतिमाओं को नहीं तोड़ेगा। तब प्रतिज्ञा लेते ही बाबर और उसके सैनिकों की नेत्रों की ज्योति लौट आई ऐसा उल्लेखित है।
सचमुच आज के इस युग ऐसी प्रतिमाओं का बनना बेहद मुश्किल है।वही 42 फुट ऊंची पद्मासन पारसनाथ की मूर्ति अपने अतिशय से युक्त है। जो जैन जगत ही नहीं सभी के लिए परम श्रद्धा का केंद्र है।

अपील

ये जिन प्रतिमाएं विश्व भर में अपने आप मे एक अलौकिकता लिए हुए हैं, सरकार व समाज को इस धरोहर को संरक्षित रखे इस पर ध्यान देना आवश्यक है।
श्री अजित वरेया का अनेक अनेक आभार जो ऐसे क्षेत्र के विकास के लिए तन, मन और धन से समर्पित है।

अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी की रिपोर्ट

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